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मां की मौत के बाद बिखरा घर, 7 बेटियों को छोड़ मजदूरी पर जाता है पिता, मासूमों का बचपन अकेलेपन में कैद

Baiga Family of Khairagarh: खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के वनांचल क्षेत्र के सुदूर गांव निजामडीह से एक बेहद मार्मिक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। बैगा आदिवासी बहुल इस गांव में रहने वाले अमर सिंह के परिवार पर ऐसा दुखों का पहाड़ टूटा है, जिसने सात मासूम बच्चियों की जिंदगी को अचानक बदल कर रख दिया। करीब तीन महीने पहले अमर सिंह की पत्नी का ब्रेन ट्यूमर के कारण निधन हो गया। मां के जाने के बाद घर में पीछे रह गईं सात बेटियां, जिनकी उम्र महज 8 महीने से 12 साल के बीच है, जिस घर में कभी मां की ममता और बच्चों की किलकारियां गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा और इंतजार पसरा हुआ है।

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अमर सिंह मजदूरी कर किसी तरह परिवार का गुजारा चलाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन रोज काम पर जाने की मजबूरी के कारण सातों बच्चियां घर में अकेली रह जाती हैं। सबसे छोटी बच्ची महज 8 महीने की है, जिसे सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत है। गांव वालों का कहना है कि मां के निधन के बाद बच्चियों की हालत पहले जैसी नहीं रही, उनके चेहरों से मासूम मुस्कान भी गायब हो गई है। गांव के लोगों और महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं समय-समय पर घर पहुंचकर बच्चियों की देखरेख कर रही हैं। ग्रामीण दसारी मेराज ने बताया कि पिता के काम पर जाने के दौरान बच्चियों को संभालना बेहद कठिन हो जाता है, खासकर छोटी बच्ची के लिए लगातार देखभाल जरूरी है। (Baiga Family of Khairagarh)

जिला प्रशासन ने लिया संज्ञान

मामले की जानकारी मिलने के बाद जिला प्रशासन भी सक्रिय हुआ है। जिला पंचायत सीईओ प्रेम कुमार पटेल ने बताया कि योजना के तहत महिला समूह की महिलाओं को बच्चियों की देखरेख की जिम्मेदारी दी गई है और प्रशासन हर संभव मदद के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि पिता के मजदूरी पर जाने के दौरान बच्चियां अकेली न रहें, इसके लिए लगातार निगरानी की जा रही है। अब यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी है। 

अमर सिंह के सामने दोहरी चुनौती है- एक ओर परिवार का पेट भरने की मजबूरी तो दूसरी ओर मासूम बेटियों को अकेला छोड़ने का दर्द। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन सात बेटियों की जिंदगी में फिर से उम्मीद की रोशनी लौट पाएगी ? क्या प्रशासन और समाज मिलकर इन बच्चियों को सुरक्षित और बेहतर भविष्य दे पाएंगे ? फिलहाल अमर सिंह की नजरें प्रशासन और समाज की मदद पर टिकी हैं, ताकि उनकी बेटियों की परवरिश और देखभाल में कोई कमी न रह जाए।

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