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इतिहास, शोध और शिक्षा को समर्पित डॉ. किशोर कुमार अग्रवाल का प्रेरणादायी जीवन, छत्तीसगढ़ इतिहास के कहलाते हैं ‘इनसाइक्लोपीडिया’

आलेख : डॉक्टर सरिता साहू – भिलाई, छत्तीसगढ़

Dr Kishore Kumar Agarwal: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना को नई दिशा देने वाले वरिष्ठ इतिहासकार, शिक्षाविद् और शोध मार्गदर्शक डॉ. किशोर कुमार अग्रवाल का नाम प्रदेश के बौद्धिक जगत में अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। छत्तीसगढ़ के इतिहास के ‘इनसाइक्लोपीडिया’ के रूप में प्रसिद्ध डॉ. अग्रवाल ने लगभग 36 सालों तक अध्यापन, शोध, इतिहास लेखन और सामाजिक योगदान के माध्यम से ऐसी अमिट पहचान बनाई, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

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7 जनवरी 1957 को इलाहाबाद में जन्मे डॉ. किशोर कुमार अग्रवाल के पिता बद्री प्रसाद अग्रवाल और माता गंगा देवी अग्रवाल थी। प्रारंभिक शिक्षा सप्रे शाला से प्राप्त करने के बाद उन्होंने दुर्गा महाविद्यालय से स्नातक की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन शाला में प्रवेश लिया, जहां इतिहास विषय ने उनके जीवन की दिशा निर्धारित कर दी। विश्वविद्यालय में उन्हें डॉ. ध्यानेश्वर अवस्थी, डॉ. एम.ए. खान एवं डॉ. रविंद्रनाथ मिश्रा जैसे विद्वान गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ, जिनके मार्गदर्शन ने उनमें इतिहास और शोध के प्रति गहरी रुचि विकसित की।

शोध कार्य और इतिहास के प्रति समर्पण

स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और राष्ट्रीय आंदोलन पर शोध कार्य शुरू किया। उनके शोध निर्देशक डॉ. आर.एम. सिन्हा थे। बाद में डॉ. एम.ए. खान के सहयोग और मार्गदर्शन में उन्होंने अपना शोध कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया। उनका शोध प्रबंध छत्तीसगढ़ इतिहास अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। डॉ. अग्रवाल ने अपने अध्यापन जीवन की शुरुआत साल 1983 में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय से की। इसके बाद उन्होंने गाडरवारा तथा बालोद महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी।

लगभग 11 सालों तक बालोद में अध्यापन करने के बाद 1997 में उनका स्थानांतरण शासकीय साइंस कॉलेज में हुआ। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ, जहाँ स्नातकोत्तर विभाग में कार्य करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ इतिहास के अध्ययन और शोध को नई दिशा प्रदान की। दुर्ग प्रवास के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी निभाई तथा मूल स्रोतों पर आधारित शोध पत्र प्रस्तुत किए। उनके शोध कार्यों ने छत्तीसगढ़ के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और जनजातीय इतिहास के अनेक अनछुए पहलुओं को सामने लाया। देश की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में उनके 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।

राष्ट्रीय संगोष्ठियों के माध्यम से नई पहचान

डॉ. अग्रवाल का सबसे उल्लेखनीय योगदान छत्तीसगढ़ केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठियों के आयोजन को माना जाता है। वर्ष 2004 में आयोजित पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी “स्वतंत्रोत्तर छत्तीसगढ़” विषय पर आधारित थी। इस संगोष्ठी के शोध पत्रों का संकलन इतना महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि उसे विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में अनुशंसित पुस्तक के रूप में शामिल किया गया। इसके बाद वर्ष 2005 में “छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक स्रोत” तथा वर्ष 2006 में दुर्ग जिले के स्थापना शताब्दी वर्ष पर ऐतिहासिक धरोहरों और पुरातात्विक स्रोतों पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

युवा शोधार्थियों के प्रेरणास्रोत

इन आयोजनों में ऐतिहासिक सिक्कों, पुरावशेषों और दुर्लभ धरोहरों की प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इसे छत्तीसगढ़ में अपने प्रकार की पहली विस्तृत ऐतिहासिक प्रदर्शनी माना गया। वर्ष 2008 में उन्होंने इतिहास लेखन कार्यशाला आयोजित कर युवा शोधार्थियों को शोध पद्धति एवं शोध पत्र लेखन की बारीकियाँ सिखाईं। वहीं वर्ष 2012 में “20वीं सदी का भारत : एक ऐतिहासिक अनुशीलन” विषय पर आयोजित संगोष्ठी ने राष्ट्रीय इतिहास और छत्तीसगढ़ के संबंधों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।

डॉ. अग्रवाल ने प्रशासनिक दायित्वों का भी कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। प्रभारी प्राचार्य के रूप में जामगांव (आर), पाटन स्थित महाविद्यालय में कार्य करते हुए उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संस्थान के विकास को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। प्रतिदिन लगभग 108 किलोमीटर की यात्रा कर उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन किया और महाविद्यालय भवन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्यार्थियों के बीच वे अनुशासन, समयपालन और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं। वर्ष 2016 में उनका स्थानांतरण डॉ. खूबचंद बघेल शासकीय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय में हुआ। यहाँ भी उन्होंने अपने अनुभव और ज्ञान से विद्यार्थियों को लाभान्वित किया।

डॉ. अग्रवाल जी के साथ डॉ. सरिता साहू व अन्य

उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय की प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त किया। मार्च 2018 में उन्होंने “19वीं एवं 20वीं शताब्दी में सामाजिक चेतना : छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित कर इतिहास के सामाजिक आयामों को सामने लाने का कार्य किया। डॉ. अग्रवाल ने विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम निर्माण एवं संशोधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, दुर्ग विश्वविद्यालय, सरगुजा विश्वविद्यालय, बिलासपुर विश्वविद्यालय एवं बस्तर विश्वविद्यालय के अध्ययन मंडलों के सदस्य रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग एवं माध्यमिक शिक्षा मंडल के पाठ्यक्रम निर्माण में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।

युवा शोधार्थियों के प्रेरणास्रोत

वे छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग तथा व्यावसायिक परीक्षा मंडल में विषय विशेषज्ञ के रूप में लंबे समय तक कार्यरत रहे। साथ ही इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय एवं भोज मुक्त विश्वविद्यालय में काउंसलर के रूप में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करते रहे। शोध निर्देशन के क्षेत्र में डॉ. अग्रवाल का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने 13 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि दिलाई। मौखिक इतिहास और क्षेत्रीय इतिहास जैसे जटिल विषयों पर शोध कार्य करवाकर उन्होंने इतिहास लेखन की नई परंपरा स्थापित की। छत्तीसगढ़ में मौखिक स्रोतों पर आधारित इतिहास लेखन को बढ़ावा देने वाले अग्रणी शोध निर्देशकों में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

पुरातत्व संरक्षण के क्षेत्र में भी योगदान

पुरातत्व संरक्षण के क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र में मिले पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी प्रशासन तक पहुँचाकर उन्होंने उस स्थल को राज्य संरक्षित क्षेत्र घोषित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनकी ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति संवेदनशीलता और समर्पण को दर्शाता है। डॉ. अग्रवाल का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, विनम्र और सहयोगी रहा है। वे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के पक्षधर रहे हैं और समय-समय पर विभागीय सेमिनार, परिचर्चा, भाषण प्रतियोगिता एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करवाते रहे। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उन्होंने अनेक निःशुल्क कार्यशालाओं का आयोजन भी किया।

आज भी शोध और समाज सेवा से जुड़े

लगभग 36 वर्षों की गौरवपूर्ण सेवा के पश्चात डॉ. किशोर कुमार अग्रवाल 31 मार्च 2020 को सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में वे रायपुर की पुरानी बस्ती स्थित तुरी हटरी के समीप निवासरत हैं और आज भी इतिहास, शोध एवं समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। उनके जन्मदिवस के अवसर पर शिक्षा जगत, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ दी जा रही हैं। उनके शिष्यों का मानना है कि डॉ. किशोर कुमार अग्रवाल केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा इतिहासकार हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के इतिहास को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य किया है।

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