मित्रता : संबंधों की आत्मा और मानव जीवन का संतुलन
आलेख : डॉ. सरिता साहू भिलाई, छत्तीसगढ़ मित्रता मानव जीवन का सबसे सुंदर, पवित्र और आत्मीय संबंध है। यह केवल साथ बैठने, हँसने या समय बिताने का नाम नहीं, बल्कि वह भाव है जिसमें मनुष्य किसी दूसरे व्यक्ति को अपने स्वार्थ से अधिक महत्व देने लगता है। मित्रता किसी प्रकार का व्यापार नहीं होती, जहाँ लाभ और हानि का हिसाब रखा जाए। यह निस्वार्थ प्रेम, विश्वास, सम्मान और स्वतंत्रता का ऐसा संबंध है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित और स्वीकार्य महसूस करता है।
मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है। वह केवल भोजन, धन और सुविधाओं से नहीं जीता, बल्कि भावनात्मक सहारे से भी जीवित रहता है। यदि उसके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति न हो जिसके सामने वह अपने मन की बात कह सके, तो भीतर अकेलापन बढ़ने लगता है। मित्र ही वह व्यक्ति होता है जिसके सामने मनुष्य बिना भय, संकोच और औपचारिकता के स्वयं को व्यक्त कर सकता है। मित्रता व्यक्ति को मानसिक शक्ति देती है, सही सलाह देती है और कठिन समय में उसे टूटने नहीं देती।
भारतीय संस्कृति में कृष्ण और सुदामा की मित्रता को आदर्श माना गया है। यह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं था, बल्कि आत्मीयता, समानता और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक था। श्रीकृष्ण राजा थे और सुदामा अत्यंत निर्धन, फिर भी दोनों के बीच कभी ऊँच-नीच की भावना नहीं आई। इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि सच्ची मित्रता व्यक्ति की आर्थिक या सामाजिक स्थिति पर नहीं, बल्कि भावनात्मक सच्चाई पर आधारित होती है।
आज भी भारतीय समाज में ऐसी परंपराएँ जीवित हैं, जहाँ मित्रता को जीवनभर निभाया जाता है। छत्तीसढ़ की लोक संस्कृति इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है। यहाँ जवांरा, भोजली और मितान जैसी परंपराएँ केवल उत्सव नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और आत्मीय संबंधों की मजबूत नींव हैं। इन परंपराओं के माध्यम से दो व्यक्ति जीवनभर के लिए मित्रता के बंधन में बंध जाते हैं और केवल व्यक्ति ही नहीं, पूरा परिवार उस संबंध का सम्मान करता है। यह बताता है कि संबंध केवल रक्त से नहीं, बल्कि विश्वास और संवेदना से भी बनते हैं।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ स्त्री और पुरुष दोनों को अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त रही है। भारतीय समाज के कई हिस्सों में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना गया, लेकिन छत्तीसगढ़ की परंपराओं में पुनर्विवाह की स्वीकृति भी दिखाई देती है। इसका मूल भाव यह है कि जीवन को केवल परंपरा की कठोर सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा गया, बल्कि मनुष्य की गरिमा और उसके सुख को महत्व दिया गया। महिलाओं को पुनर्विवाह की स्वतंत्रता देना इस बात का प्रमाण है कि उन्हें केवल किसी संबंध की वस्तु नहीं, बल्कि स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया गया।
यहाँ स्त्री और पुरुष के संबंधों में मित्रता की भावना अधिक महत्वपूर्ण रही है। पुरुषों और महिलाओं को एक-दूसरे के साथ सहज व्यवहार करने की स्वतंत्रता मिली। क्योंकि जहाँ स्वतंत्रता होती है, वहीं व्यक्ति का मानसिक और भावनात्मक विकास संभव होता है। लेकिन आधुनिक पारिवारिक जीवन में एक बड़ी समस्या यह दिखाई देती है कि विवाह के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे को नियंत्रित करने लगते हैं। प्रेम और मित्रता की जगह अधिकार और संदेह ले लेते हैं। जब किसी संबंध में स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, तब वहाँ घुटन पैदा होती है। व्यक्ति अपने वास्तविक विचारों और भावनाओं को छिपाने लगता है। यही स्थिति आगे चलकर मानसिक तनाव, दूरी और विवाद को जन्म देती है। पति-पत्नी यदि केवल अधिकार के आधार पर संबंध निभाएँगे, तो वह संबंध बोझ बन जाएगा। लेकिन यदि वही संबंध मित्रता पर आधारित हो, तो उसमें संवाद, समझ और विश्वास बना रहेगा।
विवाह के बाद कई बार पत्नी पति पर इतना अधिकार चाहती है कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुराने संबंधों की गरिमा प्रभावित होने लगती है। वह भूल जाती है कि पति का व्यक्तित्व उसके परिवार, मित्रों और पुराने संबंधों से बना है। पति पत्नी में प्रेम के साथ मित्रता, समझ और भावनात्मक सहारा भी खोजता है।
आज समाज की विडंबना यह है कि पत्नी को “वामांगी” तो माना जाता है, लेकिन उसे मित्र या प्रेमिका के रूप में स्वीकार करने में संकोच किया जाता है। जबकि सबसे स्वस्थ विवाह वही होता है जिसमें पति और पत्नी एक-दूसरे के मित्र बन सकें। मित्रता का अर्थ मर्यादा का टूटना नहीं, बल्कि भावनात्मक समानता और संवाद का जीवित रहना है।
यदि विवाह के बाद कोई स्त्री या पुरुष अपने विपरीत जेंडर के किसी व्यक्ति से सहज मित्रता रखता है, तो समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। इसका कारण यह है कि हम आज भी मनुष्य को मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि उसके जेंडर के आधार पर देखने के आदी हो चुके हैं। स्त्री और पुरुष के बीच हर संबंध को संदेह से जोड़ देना समाज की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है।
वास्तव में हर संबंध की अपनी गरिमा होती है। विवाह के बाद एक स्त्री और एक पुरुष अनेक नए रिश्तों से जुड़ते हैं। यदि उन रिश्तों में मित्रता का भाव हो, तो परिवार अधिक स्वस्थ और संतुलित बन सकता है। उदाहरण के लिए सास और बहू के संबंध को केवल अधिकार और कर्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि मित्रवत संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि सास बहू को केवल बेटे की पत्नी न समझकर एक आत्मीय व्यक्ति के रूप में स्वीकार करे और बहू भी सास को केवल नियंत्रण करने वाली स्त्री न माने, तो परिवार में तनाव कम हो सकते हैं।
इसी प्रकार ससुर और बहू के बीच भी मर्यादित किंतु आत्मीय संबंध होने चाहिए। ऐसा संबंध जहाँ सम्मान बना रहे, लेकिन संवाद भी जीवित रहे। यदि परिवार के सदस्य एक-दूसरे की परेशानियों और दुखों को समझ सकें, तो कई समस्याएँ पति तक पहुँचने से पहले ही हल हो सकती हैं। यही स्वस्थ परिवार की पहचान है।
आज समाज में यह भी देखा जाता है कि कई दामाद स्वयं को ससुराल में श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। वे सम्मान तो चाहते हैं, लेकिन बेटे जैसी जिम्मेदारियाँ निभाने से बचते हैं। जबकि यदि दामाद अपनी पत्नी के माता-पिता और भाई-बहनों को उसी आत्मीयता से अपनाए, जैसे अपने परिवार को अपनाता है, तो संबंध अधिक मजबूत हो सकते हैं। यदि वह मित्रवत भावना और जिम्मेदारी के साथ ससुराल से जुड़ता है, तो पति-पत्नी के बीच भी विश्वास और प्रेम बढ़ता है।
बेटियाँ माँ के जीवन में नई शक्ति और सम्मान का भाव जगाती हैं। कई बार वे माँ को वे अधिकार और आत्मविश्वास दिलाने का प्रयास करती हैं, जिनसे वह जीवनभर वंचित रहीं। वहीं माँ और बेटे का मित्रवत संबंध परिवार में संतुलन, अपनापन और भावनात्मक सुरक्षा बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
परिवारों में केवल पति-पत्नी या सास-बहू के संबंध ही नहीं, बल्कि भाई-बहन के संबंध भी आज कई बार तनावपूर्ण दिखाई देते हैं। कुछ परिवारों में भाई-बहन के बीच वैमनस्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कई बार माता-पिता भय, भावनात्मक दबाव या परिस्थितियों के कारण सारे अधिकार बेटियों को सौंप देते हैं। कुछ बहनें स्वयं को परिवार का मुखिया समझने लगती हैं और पूरे परिवार को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं।
ऐसी स्थिति में भाई मानसिक रूप से कमजोर पड़ने लगता है। वह अपने ही परिवार में सम्मानजनक स्थिति नहीं बना पाता। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास टूटने लगता है। इसका प्रभाव उसके वैवाहिक जीवन पर भी पड़ता है। पत्नी और बच्चों की नजरों में भी उसकी स्थिति कमजोर होने लगती है। जब किसी पुरुष को अपने ही परिवार में सम्मान और निर्णय का अधिकार नहीं मिलता, तो उसके भीतर तनाव, असंतोष और हीनभावना पैदा होने लगती है। यही तनाव आगे चलकर पूरे परिवार के संबंधों को प्रभावित करता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बेटियों या बहनों को अधिकार नहीं मिलने चाहिए। वास्तविक समस्या अधिकार नहीं, बल्कि संतुलन और संवेदनशीलता की कमी है। परिवार किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण से नहीं, बल्कि सहभागिता और सम्मान से चलता है। यदि भाई-बहन एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी या विरोधी के रूप में देखने लगें, तो परिवार टूटने लगता है। लेकिन यदि वे मित्रवत संबंध बनाए रखें, तो परिवार की एकता बनी रहती है।
वास्तव में हर संबंध की आत्मा मित्रता है। जहाँ मित्रता होती है, वहाँ संवाद जीवित रहता है। वहाँ भय नहीं, बल्कि विश्वास होता है। वहाँ अधिकार नहीं, बल्कि सहभागिता होती है। परिवार और समाज तभी स्वस्थ बन सकते हैं जब संबंधों को नियंत्रण और संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि संवेदना और मित्रता के आधार पर जिया जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्त्री और पुरुष दोनों को पहले मानव के रूप में देखें। उनके संबंधों को जेंडर के संदेह से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की दृष्टि से समझें। विवाह, परिवार और समाज तभी मजबूत होंगे जब उनमें मित्रता, स्वतंत्रता, सम्मान और संवाद जीवित रहेंगे। क्योंकि अंततः वही संबंध लंबे समय तक टिकते हैं जिनमें मनुष्य स्वयं को सम्मानित, स्वतंत्र और समझा हुआ महसूस करता है।
आलेख : डॉ. सरिता साहू भिलाई, छ.ग.

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