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ईरान में ‘रिजीम चेंज’ का सीक्रेट प्लान फेल ? ट्रंप-नेतन्याहू का ‘मिशन अहमदीनेजाद’ क्यों नहीं हो पाया कामयाब ?

Iran Regime Change Failure: ईरान में सत्ता परिवर्तन को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला दावा सामने आया है। दावा किया जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान में सिर्फ सैन्य कार्रवाई के लिए हमला नहीं किया था, बल्कि उनका असली मकसद तेहरान की सत्ता संरचना को बदलना था। रिपोर्ट्स के मुताबिक वॉशिंगटन और तेल अवीव की योजना ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को सत्ता में लाने की थी, ताकि ईरान में ऐसा नेतृत्व स्थापित किया जा सके जो अमेरिका के हितों के मुताबिक काम करे, लेकिन यह पूरा मिशन शुरू होने से पहले ही बिखर गया। बताया जा रहा है कि अहमदीनेजाद ने खुद ही अमेरिका-इजरायल के कथित प्लान से दूरी बना ली, जिसके बाद ट्रंप प्रशासन का मिशन अहमदीनेजाद पूरी तरह फेल हो गया।

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अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं। फरवरी 2026 में तेहरान और कई सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों के पीछे भी यही रणनीति मानी जा रही थी। इन हमलों का मकसद सिर्फ ईरान के परमाणु प्लांट्स को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि देश के मौजूदा सत्ता ढांचे को अस्थिर कर रिजीम चेंज की जमीन तैयार करना भी बताया जा रहा है। हालांकि भारी बमबारी, सैन्य कमांडरों की मौत और लगातार दबाव के बावजूद अमेरिका और इजरायल अपने मुख्य लक्ष्य हासिल नहीं कर सके। ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नहीं रुका। सत्ता परिवर्तन नहीं हो पाया। खामेनेई शासन बना रहा। जनता ने विद्रोह के बजाय बाहरी हमलों का विरोध किया।

न्यूयॉर्क टाइम्स रिपोर्ट में बड़ा दावा

न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्ट के मुताबिक अगर ईरान में सत्ता ढांचा टूट जाता, तो अमेरिका-इजरायल जिस चेहरे को आगे लाना चाहते थे, वो कोई मौजूदा मंत्री या सैन्य नेता नहीं बल्कि पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका को लगता था कि अहमदीनेजाद ईरान की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था को संभाल सकते हैं और संक्रमण काल में स्थिरता ला सकते हैं। दिलचस्प बात ये है कि कभी अमेरिका और इजरायल के सबसे कट्टर विरोधी रहे अहमदीनेजाद को ही इस कथित प्लान का केंद्र बनाया गया। (Iran Regime Change Failure)

कौन हैं महमूद अहमदीनेजाद ?

  • 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे।
  • परमाणु कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया।
  • अमेरिका और इजरायल के मुखर विरोधी माने गए।
  • पश्चिमी देशों के खिलाफ आक्रामक बयानों के लिए चर्चित रहे।
  • बाद के सालों में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई से उनके संबंध खराब हो गए।

‘मिशन अहमदीनेजाद’ कैसे हुआ फेल ?

यही टकराव अमेरिका और इजरायल के लिए अवसर माना जा रहा था। माना गया कि खामेनेई से दूरी रखने वाले अहमदीनेजाद को सत्ता परिवर्तन के बाद आगे किया जा सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी 2026 में अहमदीनेजाद के तेहरान स्थित घर के पास जो हवाई हमला हुआ, उसका उद्देश्य उन्हें खत्म करना नहीं बल्कि कथित तौर पर नजरबंदी से बाहर निकालना था, लेकिन हमला उल्टा पड़ गया। कई बॉडीगार्ड्स मारे गए। अहमदीनेजाद गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद उन्होंने कथित सहयोग से हाथ पीछे खींच लिया। बताया जाता है कि इस घटना के बाद अहमदीनेजाद का अमेरिका-इजरायल की पूरी योजना से मोहभंग हो गया। (Iran Regime Change Failure)

तीन चरणों में तैयार था ‘रिजीम चेंज’ प्लान

हमले के बाद से वो सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई दिए हैं। उनकी मौजूदा स्थिति को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पहला चरण- ताबड़तोड़ हवाई हमले, ईरान के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाना और कुर्द लड़ाकों को सक्रिय करना। दूसरा चरण- देश में अराजकता और गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा करना, ताकि लगे कि ईरानी शासन नियंत्रण खो चुका है। तीसरा चरण- गैस, बिजली और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाकर जनता में असंतोष बढ़ाना और फिर नए नेतृत्व को आगे लाना। बताया जा रहा है कि इसी चरण में अहमदीनेजाद को सत्ता के चेहरे के तौर पर पेश करने की तैयारी थी।

क्यों नाकाम हुआ अमेरिका-इजरायल का प्लान ?

विश्लेषकों के मुताबिक ट्रंप और नेतन्याहू को उम्मीद थी कि हमलों के बाद ईरान में जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आएगी, लेकिन इसके उलट हुआ। लोग विरोध में जरूर उतरे, लेकिन अपनी सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिका और इजरायल के खिलाफ। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरानी संस्थाओं की पकड़, सुरक्षा तंत्र की मजबूती और राष्ट्रवादी भावना को कम आंक लिया। यही उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। ईरान में कथित रिजीम चेंज की इस असफल कोशिश ने साफ कर दिया है कि सिर्फ सैन्य हमलों के जरिए किसी देश की सत्ता बदलना आसान नहीं है। अमेरिका और इजरायल की रणनीति, अहमदीनेजाद की कथित भूमिका और ईरान के अंदरूनी समीकरण आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति को और ज्यादा अस्थिर कर सकते हैं।

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