आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- जो कुत्तों को लेकर चिंतित, वे उसे अपने घर ले जाएं

SC on Stray Dogs: देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों के हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों में एक ऐसा वायरस होता है, जिसका कोई इलाज नहीं है और ऐसे हमलों के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि कुत्तों को सार्वजनिक जगहों पर खाना खिलाने वालों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि सरकारें इस गंभीर समस्या पर कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं। कोर्ट ने चेताया कि बच्चों और बुजुर्गों को कुत्तों के काटने, घायल होने या मौत के हर मामले में राज्य सरकारों पर भारी मुआवजा लगाया जा सकता है।
यह भी पढ़ें:- मुख्यमंत्री साय बस्तर के समग्र विकास को लेकर ले रहे हैं उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक
इमोशन सिर्फ कुत्तों के लिए क्यों ?: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान एनिमल ट्रस्ट की ओर से पेश एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि यह मामला भावनाओं से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि कुत्तों को मारना या सिर्फ नसबंदी करना कारगर समाधान नहीं है और कोई भी तर्क क्रूरता को सही नहीं ठहरा सकता। इस पर बेंच ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इमोशन सिर्फ कुत्तों के लिए ही क्यों दिख रहा है? जब 9 साल के बच्चे पर कुत्ते हमला करते हैं तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? क्या हम आंखें मूंद लें ? कोर्ट ने दो टूक कहा कि अगर किसी को कुत्तों से इतना लगाव है तो उन्हें अपने घर ले जाएं। उन्हें सड़कों पर घूमने, काटने और लोगों को डराने की इजाजत क्यों दी जाए। (SC on Stray Dogs)
अब तक इंसानों के लिए इतनी लंबी बहस नहीं देखी: जस्टिस मेहता
जस्टिस संदीप मेहता ने एक महिला वकील की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 2011 में प्रमोशन के बाद से मैंने इतनी लंबी बहसें कभी नहीं सुनी और अब तक किसी ने इंसानों के लिए इतनी लंबी बहस नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में एक वकील ने कोर्ट को सड़कों पर रहने वाले अनाथ बच्चों के आंकड़े दिखाए थे, लेकिन उनके लिए ऐसी भावनात्मक पैरवी बहुत कम देखने को मिलती है। एक अन्य महिला वकील ने कोर्ट में कहा कि सड़कों से बच्चों को हटाया जाना चाहिए, कुत्तों को नहीं। उन्होंने दावा किया कि रेलवे स्टेशन पर अगर किसी बच्ची के पास कुत्ता सो रहा हो तो उसके साथ अपराध की आशंका कम होती है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में उन्हें कुत्तों के साथ चलने में ज्यादा सुरक्षित महसूस होता है।
कुत्तों को गोद लेने की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग
वकील ने यह भी बताया कि वह दिल्ली की ‘डॉग अम्मा’ के नाम से मशहूर 80 साल की महिला का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जो सड़क पर रहते हुए करीब 200 कुत्तों की देखभाल करती हैं। उन्होंने कुत्तों को गोद लेने की राष्ट्रीय नीति बनाने और अभियान चलाने की मांग की। इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि अगर कोई आवारा कुत्ता किसी पर हमला करता है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्ता किसी के कब्जे में नहीं होना चाहिए। अगर आप पालतू जानवर रखना चाहते हैं तो लाइसेंस लें। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अधिकारियों की भूमिका पर भी नाराजगी जताई।
जस्टिस मेहता ने की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस मेहता ने कहा कि सरकारी तंत्र की निष्क्रियता के कारण यह समस्या हजार गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा कि हमें अधिकारियों से जवाब लेने में आधा दिन लग जाता है। यह अदालत की कार्यवाही से ज्यादा एक सार्वजनिक मंच बन गया है। डॉग बाइट की शिकार रही कामना पांडे ने कोर्ट में कहा कि कुत्तों की आक्रामकता के पीछे अक्सर इंसानों की क्रूरता होती है। उन्होंने बताया कि 20 साल पहले उन्हें एक कुत्ते ने काटा था, लेकिन बाद में पता चला कि उस कुत्ते को लगातार प्रताड़ित किया जाता था। (SC on Stray Dogs)
20 जनवरी को होगी अगली सुनवाई
उन्होंने उसी कुत्ते को गोद लिया और वह कभी आक्रामक नहीं हुआ। सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने दलील दी कि कुत्ते इकोसिस्टम का हिस्सा हैं और चूहों जैसी समस्याओं को नियंत्रित करने में उनकी भूमिका है। इस पर कोर्ट ने कहा कि इंसानों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में ठोस आदेश पारित करना चाहता है। आज की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अगली तारीख 20 जनवरी को दोपहर 2 बजे तय की है। (SC on Stray Dogs)



