जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग प्रस्ताव अधर में, धनखड़ के इस्तीफे से रुक गई प्रक्रिया – अब आगे क्या?

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Varma) के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया महाभियोग प्रस्ताव अब कानूनी और संवैधानिक दुविधा में फंस गया है। कांग्रेस और INDIA गठबंधन के 63 सांसदों के समर्थन से राज्यसभा में यह प्रस्ताव पेश किया गया था, जिसे तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन प्रस्ताव पर अगली प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उपराष्ट्रपति धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया, जिससे अब यह मामला ठहर गया है।
यह भी पढ़े :- Hareli Tihar 2025: हरेली तिहार पर मुख्यमंत्री निवास में पारंपरिक उल्लास के साथ होगा विशेष आयोजन
क्या हैं आरोप?
विपक्ष ने जस्टिस वर्मा (Justice Yashwant Varma) पर न्यायिक पक्षपात, जनहित याचिकाओं की उपेक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में असंवेदनशीलता जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रस्ताव के अनुसार, इन आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित की जानी थी, लेकिन धनखड़ के इस्तीफे के चलते अब तक यह कदम नहीं उठाया जा सका।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार होने पर सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ की तीन-सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। समिति द्वारा दोष सिद्ध होने पर संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति उस जज को पद से हटा सकते हैं।
बीजेपी में मतभेद की चर्चा
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी नेतृत्व में इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ वरिष्ठ नेता इसे विपक्ष का राजनीतिक स्टंट मानकर पूरी तरह नजरअंदाज करने के पक्ष में हैं, जबकि अन्य नेताओं का मानना है कि यदि विपक्ष इसे जनता के बीच प्रमुख मुद्दा बनाता है, तो सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना पड़ेगा।
क्या आगे हो सकता है?
यदि राज्यसभा का नया सभापति प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं करता है, तो यह प्रस्ताव स्वतः निष्क्रिय हो सकता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे को ‘न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही’ की लड़ाई बताकर जनमंच पर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। (Justice Yashwant Varma)
सरकार की चुप्पी
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद न्यायपालिका से टकराव के संकेत देना सरकार के लिए संवेदनशील हो सकता है।



