मानसिक रूप से दिव्यांग रेप पीड़िता को न्याय, हाईकोर्ट ने दी गर्भपात की अनुमति
HC Give Abortion Permission: बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मानसिक रूप से दिव्यांग युवती को गर्भपात की अनुमति दे दी है। यह मामला यौन शोषण के कारण युवती के गर्भवती होने से जुड़ा हुआ था, जिसमें कोर्ट ने पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पहले ही चरण में कांकेर मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को निर्देश दिया था कि 18 अप्रैल को विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम गठित कर पीड़िता की मेडिकल जांच कराई जाए।
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टीम में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) को शामिल होना अनिवार्य किया गया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 3(2) और संबंधित नियमों के तहत पीड़िता की शारीरिक और मानसिक स्थिति, गर्भावस्था की अवधि समेत गर्भपात से संभावित जोखिमों का मूल्यांकन किया जाए। मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद हुई अंतिम सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और खुद हाईकोर्ट की ओर से स्थापित कानूनी मिसालों के आधार पर यह स्पष्ट है कि पीड़िता को अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य करना उसके लिए गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान का कारण बन सकता है। ऐसे में कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति देना उचित समझा। (HC Give Abortion Permission)
कांकेर CMHO के सामने प्रस्तुत होने के निर्देश
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि पीड़िता अपने अभिभावक या किसी नजदीकी रिश्तेदार के साथ कांकेर CMHO सामने प्रस्तुत हो। CMHO को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए कि गर्भपात की पूरी प्रक्रिया कानून के प्रावधानों के अनुरूप सुरक्षित तरीके से पूरी की जाए और सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जाएं। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि गर्भपात की प्रक्रिया कम से कम दो विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में की जाए, जिनमें एक स्त्री रोग विशेषज्ञ अनिवार्य रूप से शामिल हो। साथ ही भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि संबंधित आपराधिक मामले की जांच और साक्ष्य के रूप में उसका उपयोग किया जा सके।

यह फैसला न सिर्फ पीड़िता के अधिकारों और स्वास्थ्य की रक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यौन शोषण के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया के संतुलन का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए त्वरित और संवेदनशील निर्णय देने के लिए प्रतिबद्ध है। कोर्ट के निर्देश न केवल पीड़िता को राहत प्रदान करते हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करते हैं कि आगे की कानूनी कार्रवाई मजबूत साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े। (HC Give Abortion Permission)



