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देवउठनी एकादशी सोमवार 15 नवम्बर 2021 : देवउठनी में जानें श्री हरि को जगाने की विधि एवं पूजा का शुभ मुहूर्त, पढ़ें पौराणिक कथा

देवउठनी एकादशी सोमवार 15 नवम्बर 2021 : प्रबोधिनी  कार्तिक शुक्ल एकादशी। (संदर्भ ग्रंथ वराह पुराण मदन रत्न) आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष से लेकर कार्तिक मास शुक्ल पक्ष तक विभिन्न देव देवता ब्रह्मा इंद्र रूद्र अग्नि वरुण कुबेर सूर्य और समाधि देवों से पूजित, वंदित, अभिनंदित जगत ईश्वर ,योगेश्वर क्षीर सागर में शेष शैया पर चार महा शयन करते हैं।

समय-समय पर इन 4 माह में उनके शयन या करवट परिवर्तन आदि के कर्म किए जाते हैं। इस अवधि में उनका स्पर्श वर्जित।निश्चय ही भगवान योगेश्वर कभी शयन नहीं करते हैं ।पर शरीर  हैं तो विश्राम है शयन है,”देव का हो या किसी का भी” यह शास्त्रीय विधान शयन का है।

इस वर्ष यानी में देवउठनी एकादशी 15 नवंबर को मनाया जाएगा और इसके बाद से मांगलिक कार्यों का भी आरंभ हो जाएगा। रात्रि में पूजा होती हैं। रात्रिकालीन पूजा हेतु शुभ मुहूर्त 18.20 से 19.11 व मध्यरात्रि 00.11 से 01.09 तक का समय उत्तम हैं। विशेष – किन्ही कारणों से रात्रि में पूजा परंपरा या खोटी होने से नहीं की जा सकती हो तो मुहूर्त-दिन में प्रातः 9:11 से 11:01 बजे तक या 12: 58 से 14:11 बजे तक शुभ मुहूर्त विष्णु भगवान पूजा एवम जगाने/ उठाने का है।

  •  एकादशी तिथि आरंभ समय : 14 नवंबर सुबह 06:39 बजे। 
  •  एकादशी तिथि समापन समय:- 15 नवंबर सुबह 08:03 बजे तक। 

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श्री हरि को जगाने एवं पूजन की विधि

घर के द्वार को लता पत्र फल पुष्प  बंदनवार से सजाना चाहिए।रात्रि में जागरण । 05 गन्ने का प्रयोगश्री हरि को निद्रा से उठाने  के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

  1. कार्तिक शुक्ल एकादशी रात्रि के समय शयन से जगत ईश्वर योगेश्वर विष्णु को जगाया जाता है। इस अवधि में विभिन्न मंत्र, स्त्रोत, पुराण श्रवण आदि किया जाता है।
  2.  जगाने के पूर्व या उठाने के लिए विभिन्न प्रकार की मधुर ध्वनि घंटा, शंख, मृदंग आदि की, की जाती है।
  3.  पंच देव की पूजा की जाती है। कपूर आदि से एवं घी के दीपक से उनकी आरती की जाती है। (गणेश, शिव, दुर्गा, ब्रह्मा एवम विष्णु।)
  4.  आरती की वर्तिका नारंगी या पीले रंग की हो। श्वेत रंग की वर्जित। इसलिए मौली या कलावे की वर्तिका का प्रयोग करे। रुई को रंग कर भी प्रयोग कर सकते है।
  5.  ऋतु मे उपलब्ध पुष्प, फल, शाक (सिंघाड़े, मेथी, पालक, मूली, संतरे, आदि) अर्पित किए जाते हैं। कुंद एवम अपराजिता के पुष्प श्रीहरि को विशेष प्रिय है।
  6.  भगवान विष्णु को जगाने के लिए संक्षिप्त विधि-पूर्व या पश्चिम दिशा (सूर्य पश्चिम मे इसलिए) मे मुह करे।
  7.  पृथ्वी पर लीप कर या स्वच्छ कर पृथ्वी पर या फर्श पर, 16 पत्ती के कमल की आकृति आटे या किसी भी माध्यम से बनाना चाहिए।
  8.  भगवान विष्णु के लिए – सफेद वस्त्र से 4  कलश चारो दिशाओं मे जल, भर कर स्थापित करें। 16पत्ती के कमल की आकृति पर, श्वेत वस्त्र का प्रयोग करें। 16 पतियों के कमल पर चौकी ,पाटे या  कोई आसन लकड़ी का रखे। उसके ऊपर भगवान को सफेद वस्त्र बिछाकर स्थापित करें ।भगवान की मूर्ति स्थापित करें।
  9.  पांच गन्ने (शुगर केन) चौकी के चारों ओर इन  से मंडप जैसा बनाएं (गन्ने खड़े करें एवं उनके शीर्ष स्थान को की पत्तियों को गोल घुमा कर बांध दें)।
  10. 16 पत्ती वाले कमल के ऊपर रखे हुए पाटे, चौकि या लकड़ी पर , श्वेत वस्त्र पर विराजित श्रीहरि को उठाने के लिए। गन्ने (16 पत्तियों के चारों ओर मंडप आकर मे जो गन्ने खड़े किए गए थे) उन को तोड़कर उस पाटे (जिस पर श्री हरि विराजित है) के नीचे लगाकर पाटे को (16 पतियों के कमल से ऊपर नीचे करते हुए) निम्न मंत्र बोलना चाहिए :-
    उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ गोविंद, त्यज्  निद्राम जगतपते।
    त्वयि सुप्ते जगन्नाथ ,जगत सुप्तम भवेद इदम्।।
    उत्तिष्ठते चेष्टते सर्वम उत्तिष्ठतो उत्तिष्ठत माधव।
    गता मेघा वियच्चेव निर्मलम निर्मल दिशा:।।
    पुष्प अर्पण करे- शारदानी च पुष्पाणि गृहाण् मम केशव।
    गोविंद उठिए। निद्रा का परित्याग करिए।  विश्व के स्वामी आपके सोने पर समस्त विश्व शयन जैसी अवस्था में होता है। इसलिए उठने की चेष्टा करिए। आपके उठने पर, जगने पर, है माधव सभी प्राणी की (बुद्धि) उठेंगे। सभी दिशाएं बादलों या मेघों से विमुक्त होकर स्वच्छ निर्मल दीप्तित होंगी।
  11.  जगाने के पश्चात विभिन्न ऋषि आदि, गुरु का नाम ले कर स्मरण किया जाता है. (प्रह्लाद, नारद, पुंडरीक ,व्यास, शुक, अंबरीश, शौनक, पराशर आदि)। संभव हो हवन करे।
  12.  चरणामृत एवं पंचामृत प्रसाद का वितरण करें।
  13.  राजा के कर्तव्य के रूप में माना गया है या ग्राम प्रमुख के कर्तव्य में कहा गया है कि, श्री हरि को  नगर, ग्राम या गलियों में को भ्रमण कराएं। इसमें रथ या  वाहन के रूप में या हाथ में विष्णु प्रतिमा लेकर मनुष्य को स्वयं चलना होता है। (किसी पशु का उपयोग वर्जित माना गया है।)
  14.  वामन अवतार विष्णु तथा दैत्यराज बली का भी स्मरण कर, उन्हें भी भ्रमण कराया जाता है। इस प्रकार भगवान विष्णु योग्य निद्रा का परित्याग कर प्राणी मात्र के पालन पोषण के लिए तत्पर होते हैं।
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