डिजिटल दुनिया युवाओं को खेल के मैदानों से कर रही दूर: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

Vice President Dhankhar: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने नई दिल्ली में स्पेशल ओलंपिक एशिया पैसिफिक बोक्से और बॉलिंग प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि खेल बोली से परे की भाषा है। खेल शब्दावली से परे की भाषा है। खेल एक सार्वभौमिक भाषा है। खेल सभी बाधाओं को तोड़ता है। मानवता द्वारा परिभाषित सभी सीमाएं खेल से दूर हो जाती है। खेल मानव मन को अद्वितीय रूप से शक्ति प्रदान करते हैं। विशेष रूप से सक्षम बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों को शामिल करने वाले खेल आशा की एक नई रोशनी जलाते हैं। मुझे जीतने दो। अगर मैं नहीं जीत सकता तो मुझे प्रयास में बहादुर होना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि इन खेलों की यह भावना सदियों से मानवता की प्रगति और उत्थान को परिभाषित करती है। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि विकलांगता ने मानव आत्मा को वश में नहीं किया है। मानव आत्मा को वश में करना असंभव है। चुनौतियों की विशालता या चरमता के बावजूद मानव आत्मा स्वयं ही उभर कर सामने आती है। आत्मा अदम्य है। हमारी सभ्यता दिव्यांगजनों में दिव्यता, उदात्तता और आध्यात्मिकता देखती है। भारत ने 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए आधिकारिक रूप से बोली लगाकर एक साहसिक और उचित कदम उठाया है। इस देश की महत्वाकांक्षी दृष्टि और खेल के क्षेत्र समेत वैश्विक मामलों में केंद्र में आने के लिए भारत की तत्परता को दर्शाता है। (Vice President Dhankhar)
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जो आशा जगाने और यह सुनिश्चित करने में हाथ बंटाता है कि सभी का जीवन सार्थक हो। पूरे समाज के लिए एक गंभीर चिंता व्यक्त करना चाहूंगा और यह बहुत गंभीर है। आज की तेज तर्रार वाली डिजिटल दुनिया में हमारे युवा और बच्चे छोटी प्लास्टिक स्क्रीन यानी मोबाइल के आदी होते जा रहे हैं। वे डिजिटल खेल के मैदानों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और असली खेल के मैदानों से दूर होते जा रहे हैं। मैं हर माता-पिता से खास तौर पर यह सुनिश्चित करने का आग्रह करता हूं कि बच्चे इन स्क्रीन पर अपने जुनून के कारण असली खेल के मैदानों के लाभों से वंचित न हों। आइए सुनिश्चित करें कि यह डिजिटल जुनून बच्चों, इस पीढ़ी से असली खेल के मैदान का रोमांच, भावना और ज्ञान न छीन ले, जो सिर्फ असली खेल के मैदान ही दे सकते हैं। (Vice President Dhankhar)

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि हम सभी भारत में खेलों के प्रति दृष्टिकोण में एक बड़े बदलाव को महसूस कर सकते हैं। हम सुनते थे- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब। अब नया मंत्र है- किताब भी जरूरी खेल भी जरूरी, दोनों के बिना जिंदगी अधूरी। उन्होंने कहा कि खेल को अब पाठ्येतर गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाता है। यह शिक्षा और जीवन का एक अभिन्न अंग है, चरित्र निर्माण का माध्यम है, एकता को बढ़ावा देता है और हमें राष्ट्रीय गौरव से भर देता है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सभ्यता विश्व में अद्वितीय है। यह सभ्यता और संस्कृति 5000 साल से भी ज्यादा पुरानी है। यह प्रतिबिंबित करता है कि हम दिव्यांगजनों में दिव्यता देखते हैं। आध्यात्मिकता देखते हैं। दिव्यांगजनों के लिए उनकी ऊर्जा और क्षमता का उपयोग करने, उनकी आकांक्षाओं और सपनों को पूरा करने के लिए इकोसिस्टम उपलब्ध है। (Vice President Dhankhar)




