Anmol News Special: छत्तीसगढ़ में हाथियों का आतंक बढ़ा, जानिए साल-दर-साल संघर्ष के आंकड़े
Elephant Terror in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में हाथियों के हमले से होने वाले मौतों का आंकड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा है। आए दिन हाथी के हमले से मौत की खबरें सामने आ रही है। इसके अलावा हाथी फसलों और घरों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। पिछले 100 सालों में भी जिन इलाकों में हाथियों की उपस्थिति कभी दर्ज नहीं हुई थी, उन इलाकों तक भी हाथी लगातार पहुंच रहे हैं। हाथियों को एक जंगल से दूसरे जंगल और एक बस्ती से दूसरी बस्ती में खदेड़ा जा रहा है, लेकिन अपने घरों से विस्थापित हाथी, भोजन-पानी और जीवन की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं।
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वन विभाग के मुताबिक छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने से 12 साल पहले 1988 में 18 हाथियों के एक दल ने अविभाजित बिहार के इलाके से सरगुजा इलाके में प्रवेश किया था। बाद के सालों में इनमें से 13 हाथियों को पकड़ लिया गया और हाथियों के उत्पात पर काबू पाने की असफल कोशिश की गई, लेकिन हाथियों का कुनबा बढ़ता गया। सितंबर 2002 में राज्य में सिर्फ 32 हाथी थे, जो 2007 में 122 और 2017 में 247 तक पहुंच गया। अभी की स्थिति में 300 से 350 हाथी स्थाई रूप से छत्तीसगढ़ में रह रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के कुछ सालों तक सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ और कोरबा में ही हाथी रहते थे, जिसके चलते मानव-हाथी द्वन्द के मामले इन्हीं जिलों तक सीमित थे, लेकिन इन जिलों में भी साल-दर-साल संघर्ष के आंकड़े बढ़ते चले गए। हाथियों के साथ संघर्ष का दायरा भी इन चार जिलों से बढ़ते हुए प्रदेश के अधिकांश जिलों तक पहुंच गया। (Elephant Terror in Chhattisgarh)

छत्तीसगढ़ में एक हाथी अभ्यारण्य भी बनाया गया है, जिसका नाम लेमरू हाथी अभ्यारण्य है, जो कोरबा जिले में स्थित है, लेकिन इसके बाद भी मानव-हाथी संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। छत्तीसगढ़ में 34 वनमंडल हैं, जिनमें से 9 वनमंडल हाथी प्रभावित है। वन विभाग के मुताबिक पिछले 11 सालों में 595 लोगों की जान हाथी के हमलों से गई है, जिसमें वार्षिक औसत 54 मौतें हैं। पिछले 5 सालों में 320 मौतें हाथी के हमले से हुई है।
किस साल कितनी मौतें
- 2019-20 में 77 लोगों की मौत
- 2020-21 में 42 लोगों की मौत
- 2021-22 में 64 लोगों की मौत
- 2022-23 में 59 लोगों की मौत
- 2023-24 में 51 लोगों की मौत
- 2024-25 में 20 से ज्यादा की मौत
छत्तीसगढ़ के हाथी प्रभावित जिले
- रायगढ़
- कोरबा
- सरगुजा
- जशपुर
- सूरजपुर
- बलरामपुर
- धमतरी
- गरियाबंद
- महासमुंद
- बालोद
- कांकेर
यह जिले उत्तरी और मध्य छत्तीसगढ़ में स्थित हैं, जहां मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं ज्यादा सामने आती है। इस बीच छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने हाथियों के प्रति समाज में व्याप्त नकारात्मक धारणा को लेकर चिंता व्यक्त की है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रेम कुमार ने कहा कि हाथियों के लिए समाचार पत्रों और अन्य मीडिया माध्यमों में ‘आतंकी, उत्पाती, हत्यारा, हिंसक, पागल, बिगड़ैल, जिद्दी’ जैसे नकारात्मक शब्दों का उपयोग किया जाता है, जिससे समाज में हाथियों के प्रति भय और नकारात्मकता बढ़ती है। यह प्रवृत्ति मानव-हाथी सह-अस्तित्व के प्रयासों को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि भारत में हाथी सिर्फ एक वन्यजीव नहीं, बल्कि संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। प्राचीन काल से भगवान गणेश का प्रतीक माने जाने वाले हाथी को धैर्य, शक्ति और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है। हाथी को ‘कीस्टोन प्रजाति’ और ‘ईको-सिस्टम इंजीनियर’ भी कहा जाता है, क्योंकि वे वनों के पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके रहने से वनों की कार्बन अवशोषण क्षमता में बढ़ोतरी होती है, जिससे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। (Elephant Terror in Chhattisgarh)
हाथी और मानव के मधुर संबंध के प्रमाण
छत्तीसगढ़ के इतिहास में हाथियों का मनुष्य के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। बस्तर के 11वीं शताब्दी के ताम्रपत्रों, मुगलकालीन अभिलेखों और ब्रिटिश शासनकाल के गजेटियरों में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल की ‘आईने-अकबरी’ और कलचुरी राजाओं के शासनकाल के अभिलेखों में भी छत्तीसगढ़ के हाथियों और मनुष्यों के पारस्परिक संबंधों का प्रमाण मिलता है।
मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण
अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रेम कुमार ने मीडिया से अपील की है कि हाथियों को लेकर सकारात्मकता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जाएं। मानव-हाथी संघर्ष को सिर्फ टकराव के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, ताकि सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया जा सके। उन्होंने मीडिया को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि हाथियों का संरक्षण न सिर्फ जैव विविधता के लिए आवश्यक है, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में समाज को हाथियों के महत्व को समझना होगा और उनके संरक्षण में सकारात्मक योगदान देना होगा। (Elephant Terror in Chhattisgarh)

केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने विश्व हाथी दिवस के मौके पर राजधानी रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हाथियों के संरक्षण में भारत की अग्रणी भूमिका रही है। उन्होंने हाथियों के संरक्षण और मानव कल्याण सुनिश्चित करने के लिए अंतर-क्षेत्रीय जुड़ाव (क्रॉस सेक्टोरल एंगेजमेंट) की आवश्यकता पर बल दिया। वन मंत्री ने कहा कि अगर हम हाथियों को बचाएंगे तो वन भी समृद्ध होंगे, क्योंकि हाथियों को ‘पारिस्थितिकी तंत्र के इंजीनियर’ के रूप में जाना जाता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने देश में मानव-हाथी द्वंद को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया। मंत्री यादव ने कहा कि भारत में जंगली हाथियों की सबसे बड़ी और सुरक्षित संख्या है। हाथियों की पिछली गणना अखिल भारतीय समन्वित हाथी गणना अनुमान 2017 के अनुसार भारत में 29 हजार 964 हाथी हैं। भारत में हाथी गलियारों से संबंधित 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 14 राज्यों में 33 हाथी रिजर्व (ईआर) और 150 हाथी गलियारे हैं।
12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस
उन्होंने बताया कि भारत में हाथियों को विभिन्न खतरों से कानूनी रूप से बचाने के लिए सर्वोत्तम कानून बनाए गए हैं। हमारे देश में हाथियों के संरक्षण के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत ढांचा भी मौजूद है। देश में हाथियों के संरक्षण के प्रति अनुकूल जनमत है, जिसे मजबूत नेतृत्व का भी समर्थन प्राप्त है। इस प्रकार यह विश्व हाथियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए और मानव कल्याण समेत वन्यजीव संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कला के साथ विज्ञान सीखने के लिए भारत की ओर उन्मुख है। हर साल 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस के रूप में मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ जैविक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है और यहां हाथियों की भी अच्छी खासी संख्या है। मानव और हाथियों के बीच के द्वंद को कम करने के नजरिए से छत्तीसगढ़ को उच्च प्राथमिकता दी गई है।
हाथी-मानव द्वंद रोकने अभियान: CM विष्णुदेव साय
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ का हाथियों से बहुत पुराना नाता है। हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता हाथी-मानव द्वंद को रोकना है। इसके लिए राज्य सरकार लगातार जागरूकता कार्यक्रम संचालित कर रही है। कई नवाचार किए जा रहे हैं। हाथियों के विचरण की जानकारी ग्रामीणों को देने के लिए सरगुजा से हमर हाथी हमर गोठ रेडियो कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है, ग्रामीणों को अपनी ओर हाथियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए राज्य सरकार गज यात्रा अभियान चला रही है। “गज संकेत और सजग” एप के माध्यम से हाथी के विचरण की जानकारी ग्रामीणों को मिल रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हाथी-मानव द्वंद को रोकने के लिए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का प्रबंधन किया जा रहा है। हाथियों द्वारा फसल क्षति के लिए किसानों को दिया जा रहा मुआवजें की राशि कम है, इसे बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। हाथी-मानव द्वंद को कम करने के लिए छत्तीसगढ़ को सफलता मिली है।
छत्तीसगढ़ की धरती जैव विविधता से समृद्ध: CM साय
CM साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती जैव विविधता से समृद्ध है। जंगली भैंसे, पहाड़ी मैना, बाघ और हाथी जैसे वन्य जीव हमारे जंगलों की शान हैं। छत्तीसगढ़ के जंगल हमेशा से हाथियों के प्राकृतिक रहवास रहे हैं। हमारे प्रदेश में हाथियों के ऐतिहासिक साक्ष्य भी मिलते हैं। भागवत पुराण के गजेंद्र मोक्ष की कथा छत्तीसगढ़ की है। यह सुंदर कथा राजीव लोचन मंदिर में भी अंकित है। यहां पर भगवान राजीव लोचन को कमल का पुष्प चढ़ाते हाथी को अंकित किया गया है। जांजगीर के राजा जाज्वल्य देव ने गज शार्दुंल की उपाधि धारण की थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में हाथियों की सुरक्षा को देखते हुए बादल खोल, तमोर पिंगला को एलीफेंट रिजर्व बनाया गया है। हमारी सरकार ने गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान और तमोर पिंगला अभ्यारण्य को मिलाकर टाइगर रिजर्व बनाया गया है। यह छत्तीसगढ़ का चौथा और भारत का 53वां टाइगर रिजर्व है। इसके साथ ही लेमरू हाथी रिजर्व क्षेत्र के माध्यम से सरगुजा, कोरबा, रायगढ़ जिलों में हाथियों के संरक्षण पर काम हो रहा है। (Elephant Terror in Chhattisgarh)
हाथी हमारी संस्कृति में गहराई से रचे-बसे: CM साय
उन्होंने बताया कि हमारी छत्तीसगढ़ की संस्कृति में जनजातीय समुदाय हाथियों को बहुत शुभ मानते हैं। भारत में हाथियों को राष्ट्रीय धरोहर पशु माना जाता है। हाथी हमारी संस्कृति में गहराई से रचे-बसे हैं। ताजी हवा, ऊर्जा बचाव, अच्छी जीवन शैली के लिए आवश्यक है, जो हमें पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन से मिल सकती है। सूनी धरती में हाथी से लेकर छोटे-छोटे जानवर तक विचरण करते रहते हैं, जो पर्यावरण के संरक्षण के लिए जरूरी है। वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि राज्य में हाथी के संवर्धन के लिए यहां के वन अनुकूल है। राज्य में 44 प्रतिशत क्षेत्र वनों से आच्छादित है, जिसमें हाथियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वातावरण उपयुक्त है। यहां के अनुकूल वातावरण के कारण हाथियों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
हाथियों से बचाव के लिए क्या करें
- हाथी आने की सूचना निकटवर्ती वन कर्मचारी को तुरंत दें।
- सभी घरों के बाहर पर्याप्त रोशनी करके रखें, ताकि हाथी के आने से पहले ही दूर से पता चल जाएं।
- हाथियों का सामना होने की स्थिति में उससे ज्यादा से ज्यादा दूरी बना कर रखें।
- हाथी विचरण क्षेत्र में अपने गांवों के बुजुर्ग, अपाहिज और छोटे बच्चों की सुरक्षा का खास ध्यान रखें।
- जन-धन हानि होने की स्थिति में बदले की भावना से प्रेरित होकर हाथियों के पास न जाएं।
- पहाड़ी स्थानों में सामना होने की स्थिति में पहाड़ी की ढलान की ओर दौड़े, ऊपर की ओर नहीं, क्योंकि हाथी ढलान में तेज गति से नहीं उतर सकता, लेकिन चढ़ाई में वह दक्ष होता है।
मानव हाथी द्वंद से बचाव के लिए क्या न करें
- किसी भी तरह का शोरगुल या हल्ला न करें और उस क्षेत्र को तुरंत छोड़ दें।
- सेल्फी और फोटो लेने की उत्सुकता से भी हाथी के नजदीक बिल्कुल भी न जाएं, यह प्राण घातक हो सकता है।
- हाथियों को फसल लगे खेतों में होने की स्थिति का पता चलने पर उन्हें खदेड़ने के लिए उनके पास न जाएं, न ही जाने का प्रयास करें।
- हाथियों को गुलेल, तीर, मशाल और पत्थरों से बिल्कुल न मारें। इससे वे आक्रमक होकर आपकी दिशा में बढ़कर हमला कर सकते हैं।
- हाथी विचरण क्षेत्रों में देशी शराब और महुआ से बनी शराब न बनाएं। ना ही भंडारण करें। हाथियों को शराब की गंध दूर से आकर्षित करती है। महुआ खाने वे घरों तक आ जाते हैं। हाथियों के विचरण क्षेत्रों में तेंदूपत्ता, पटु, छतनी, बांस के संग्रह के लिये और मवेशी चराने ना जाएं।
- शौच के लिए खुले खेत या जंगल से लगे स्थानों पर न जाएं, घरों में बने शौचालयों का इस्तेमाल करे।



