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बालोद में लीज पर सरकारी स्कूल का खेल मैदान, सैकड़ों पौधों की बलि, ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के पौधे भी राख, 20 हजार के लिए दांव पर बच्चों का भविष्य !

School Playground on Lease: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस स्कूल परिसर में छात्रों की रौनक होने चाहिए थी, वहां अब खेती की तैयारी हो रही है। इतना ही नहीं ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत लगाए गए सैकड़ों पौधों को आग के हवाले कर दिया गया। मामला मोहारा गांव के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल का है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन समिति ने बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के स्कूल के खेल मैदान को एक निजी व्यक्ति को खेती के लिए लीज पर दे दिया। इस फैसले के बाद स्कूल परिसर में अवैध गतिविधियों का सिलसिला शुरू हो गया।

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आरोप है कि बिना नीलामी के खेल मैदान लीज पर दिया गया। स्कूल का ताला तोड़कर कब्जा किया गया। पांच बबूल के पेड़ काटे गए। महज 20,000 रुपए के लिए मैदान लीज पर देने का आरोप लगा है। लीज मिलने के बाद रसूखदारों ने स्कूल की मर्यादा को दरकिनार कर दिया। स्कूल का ताला तोड़ा गया और परिसर में मौजूद पेड़ों की कटाई कर दी गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां पहले ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत 255 पौधे लगाए गए थे। जमीन समतल करने के नाम पर आग लगा दी गई, जिससे सभी पौधे जलकर नष्ट हो गए। स्कूल के प्राचार्य जोसेफ चाको ने इस पूरे मामले से खुद को अलग बताते हुए कहा कि मुझसे कोई अनुमति नहीं ली गई। जब मैं स्कूल पहुंचा तो ताला टूटा हुआ था और पौधे जले हुए थे। समिति का यह फैसला पूरी तरह गलत है। (School Playground on Lease)

स्कूल प्रबंधन समिति के तर्क पर उठे सवाल

स्कूल प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरिकृष्ण गंजीर का कहना है कि स्कूल में शौचालय निर्माण के लिए 20,000 रुपए की जरूरत थी, इसलिए जमीन लीज पर दी गई। हालांकि प्राचार्य का दावा है कि स्कूल में पहले से ही पर्याप्त शौचालय मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर 20,000 रुपए की जरूरत क्यों पड़ी और इसके पीछे असली मंशा क्या थी ? सरपंच तेश्वरी साहू और ग्रामीणों ने इस पूरे मामले पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि पंचायत को इस फैसले की जानकारी तक नहीं दी गई। सरपंच का कहना है कि हमने मेहनत से ढाई सौ पौधे लगाए थे, लेकिन आज वहां राख के अलावा कुछ नहीं बचा। दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। 

जांच शुरू, अधिकारियों की चुप्पी

मामला अब जनपद पंचायत तक पहुंच गया है। जनपद पंचायत के सीईओ उमेश रात्रे ने फिलहाल कैमरे के सामने कुछ भी कहने से इनकार किया है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर जांच शुरू कर दी गई है। एक तरफ सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या चंद रुपयों के लिए बच्चों के खेल के अधिकार और पर्यावरण की बलि देना जायज है ? अब निगाहें जांच पर टिकी हैं। देखना होगा कि इस मैदान घोटाले में शामिल लोगों पर क्या कार्रवाई होती है।

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