Google Analytics —— Meta Pixel

गैंगरेप मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख, कहा- महिला की गरिमा पर हमला बर्दाश्त नहीं

HC on Gang Rape Case: बिलासपुर हाईकोर्ट ने गैंगरेप के मामले में आरोपियों की अपील खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि यह अपराध न सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ है, बल्कि महिला की गरिमा और शारीरिक अखंडता पर सीधा हमला है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों में सख्त न्यायिक कार्रवाई आवश्यक है, ताकि समाज में कानून का शासन बना रहे और यह संदेश जाए कि इस तरह के अपराध किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

यह भी पढ़ें:- छत्तीसगढ़ में ‘गौ सम्मान आह्वान अभियान’ की गूंज, रायपुर से सक्ती तक रैली, धरना और ज्ञापन के जरिए उठी बड़ी मांगें

कोर्ट ने यह भी कहा कि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर और अमानवीय है, जो सामाजिक मूल्यों और इंसानी गरिमा की पूरी तरह अनदेखी को दर्शाता है। ऐसे मामलों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है। मामला 13 मई 2023 का है। पीड़िता रात करीब 9:30 बजे डिनर के बाद अपने घर के बाहर टहल रही थी। इसी दौरान आरोपी युवराज साहू उसके पास पहुंचा और उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। बाइक पर पहले से मौजूद रविंद्र बरेठ के साथ मिलकर दोनों उसे बांधवा तालाब के पास सुनसान जगह पर ले गए, जहां उसके साथ जबरदस्ती सामूहिक दुष्कर्म किया गया।

Gang Rape in Balrampur

करीब 11:30 बजे घर लौटने के बाद पीड़िता ने पूरी घटना अपने परिवार को बताई। इसके बाद उसके पिता ने शक्ति थाना में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवाया। जांच पूरी होने के बाद आरोपी रविंद्र कुमार बरेठ, युवराज साहू और विक्की सागर के खिलाफ चालान पेश किया गया। विचारण न्यायालय ने तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत 3 साल की कठोर कैद और 1,000 रुपए जुर्माना (अदा न करने पर 6 माह अतिरिक्त सजा) और धारा 376D के तहत 20 साल की कठोर कैद और 10,000 रुपए जुर्माना (अदा न करने पर 1 साल अतिरिक्त सजा) सुनाई। (HC on Gang Rape Case)

सबूतों को कोर्ट ने माना ठोस

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों को मजबूत और विश्वसनीय माना। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है, जिसकी पुष्टि मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (MLC) और फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) रिपोर्ट से होती है। रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर और कपड़ों पर सीमेन के दाग और ह्यूमन स्पर्म पाए गए, जो आरोपियों के खिलाफ गंभीर सबूत हैं। डिवीजन बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह सही और न्यायसंगत है, इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। अपील में कोई ठोस आधार नहीं होने के कारण इसे खारिज किया जाता है। हाईकोर्ट के इस फैसले को महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सख्त रुख के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें साफ संदेश दिया गया है कि ऐसे जघन्य अपराधों में दोषियों को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जाएगी।

Back to top button
error: Content is protected !!