आपातकाल, लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार: डॉ. सरिता साहू
आपातकाल
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इसकी लोकतांत्रिक परंपराएं कोई नया विषय नहीं, बल्कि इसकी जड़ें प्राचीन इतिहास में गहराई तक फैली हैं। वैदिक काल से ही भारतीय समाज में लोकतांत्रिक तत्व मौजूद रहे हैं। लगभग 1500 ईसा पूर्व रचित ऋग्वेद में सभा और समिति जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जो उस समय की निर्णय-प्रक्रिया और जनभागीदारी को दर्शाते हैं।
छठी से चौथी सदी ईसा पूर्व के बीच बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि भारत 16 महाजनपदों में विभाजित था, जिनमें वज्जि, मल्ल और शाक्य जैसे गणराज्य लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाए हुए थे। वहां सत्ता वंशानुगत न होकर चुनाव के ज़रिए मिलती थी। हालांकि कालांतर में राजतंत्र का प्रभाव बढ़ा और लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सीमित होती चली गईं।
औपनिवेशिक शासन और आधुनिक लोकतंत्र की नींव
सन् 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के साथ भारत पर औपनिवेशिक शासन की शुरुआत हुई, जो लगभग दो शताब्दी तक चला। भारत ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में नए युग की शुरुआत की। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का उदय भारत में हुआ, लेकिन विडंबना यह रही कि इस लोकतंत्र की हत्या भारत में ही हुई — जब 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किया गया।
आपातकाल : लोकतंत्र पर काला धब्बा
25 जून 1975 की रात देश ने वह दौर देखा जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां और जनता की आवाज़ को दबाने का सिलसिला शुरू हुआ। यह सब संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत “आंतरिक सुरक्षा खतरे” का हवाला देकर किया गया।
आपातकाल लगाने के राजनीतिक कारण
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली चुनाव में भ्रष्टाचार का दोषी पाया। उनके चुनाव को निरस्त कर दिया गया और छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा हो चुका था। यह आंदोलन इंदिरा सरकार के लिए सीधी चुनौती बन गया।
सत्ता बचाने की मंशा में इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से राहत ली और फिर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आधी रात को दस्तखत करवा कर देश पर आपातकाल थोप दिया। अगले दिन उन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से इसे “देशहित में ज़रूरी कदम” बताया।
आपातकाल के दुष्परिणाम
आपातकाल में:
- करीब 35 हज़ार लोगों को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) और 15 हज़ार लोगों को डीआईआर के तहत गिरफ्तार किया गया।
- विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया।
- जबरन नसबंदी कार्यक्रम चलाया गया।
- मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप लागू कर दी गई।
- पुलिस, प्रशासन और नौकरशाही निरंकुश हो गई।
- आम जनता भयभीत होकर मौन हो गई।
शुरुआती दिनों में कानून-व्यवस्था में कुछ सुधार अवश्य दिखाई दिया, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो जनता को एहसास हुआ कि यह कदम व्यक्तिगत सत्ता बचाने के लिए था, न कि राष्ट्रहित में।
राष्ट्रवादी नेताओं का संघर्ष
अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख, जॉर्ज फर्नांडीस समेत कई नेताओं को झूठे मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया गया। मीसाबंदियों पर बर्बर अत्याचार हुए, जिसकी पुष्टि 1978 में शाह आयोग की जांच रिपोर्ट में हुई।
जनता की जागरूकता और लोकतंत्र की वापसी
लगभग 21 महीनों के बाद इंदिरा गांधी ने अपने गुरु जे. कृष्णामूर्ति की सलाह पर मार्च 1977 में आम चुनाव कराने की घोषणा की। परिणामस्वरूप जनता पार्टी ने भारी बहुमत से चुनाव जीता और इंदिरा गांधी की सत्ता समाप्त हो गई। आपातकाल कांग्रेस और इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर का सबसे काला अध्याय साबित हुआ।
आपातकाल से मिली सीख
- आपातकाल ने साबित कर दिया कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है।
- जनता में लोकतंत्र और संविधान के प्रति गहरी समझ पैदा हुई।
- चुनावों के महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।
- आपातकाल के खिलाफ जनजागरण ने यह संदेश दिया कि सत्ता का केंद्र व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रहित होना चाहिए।
- आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय था, जिसने यह सिखाया कि किसी भी परिस्थिति में नागरिक अधिकारों और जनमत का सम्मान सर्वोच्च है। आज भारत आपातकाल से सबक लेकर अधिक आत्मनिर्भर, जागरूक और राष्ट्रवादी सोच की ओर अग्रसर है।
- लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी, विधि का शासन और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से पूर्ण होता है। आपातकाल ने यह चेतना दी कि लोकतंत्र की रक्षा केवल सरकार का नहीं, हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।
आलेख : डॉ. सरिता साहू
उच्च वर्ग शिक्षक, भिलाई, जिला – दुर्ग



