Language politics in India : भाषाई राजनीति या पाखंड? नेता अंग्रेजी को कोसते हैं, बच्चों को पढ़ते हैं अंग्रेजी और विदेशी यूनिवर्सिटीज में

Language politics in India : भाषा को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज़ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा कि “जल्द ही अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी।” वहीं, महाराष्ट्र में राज ठाकरे ने मराठी पर हिंदी थोपे जाने का विरोध किया और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने हिंदी को लेकर ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ की बहस को हवा दी।
इन नेताओं की भाषाई राजनीति का असल चेहरा तब सामने आता है जब हम देखते हैं कि उनके अपने बच्चे अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़े हैं। खुद अमित शाह ने अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई की और उनके बेटे जय शाह ने लोयोला हॉल जैसे अंग्रेजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। फिर भी, शाह अंग्रेजी अखबारों को नापसंद करते हैं और भाषा को लेकर राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाते हैं।
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ठाकरे परिवार भी अलग नहीं है। उद्धव ठाकरे के बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं, बावजूद इसके वे मराठी गर्व का मुद्दा उठाते हैं। उनका यह रुख शिवसेना की पुरानी ‘मराठी मानुष’ राजनीति को पुनर्जीवित करने की कोशिश है।
इसी तरह, स्टालिन भी हिंदी थोपे जाने की बात कहकर तमिल अस्मिता की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन उनके परिवार की अगली पीढ़ी विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ रही है। (Language politics in India)
विडंबना यह है कि ये नेता जनता के सामने भाषाई अस्मिता की बात करते हैं, लेकिन अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हैं। अंग्रेजी अब औपनिवेशिक नहीं बल्कि आकांक्षा की भाषा बन चुकी है। युवा भारत नौकरी और विकास चाहता है, भाषाई झगड़े नहीं। (Language politics in India)
आज देश के कोने-कोने में अंग्रेजी कोचिंग संस्थान तेजी से बढ़ रहे हैं। हिंदी और तमिल फिल्मों की सफलता, महेंद्र सिंह धोनी जैसे खिलाड़ी की चेन्नई में लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि भाषाई सीमाएं अब टूट रही हैं।
भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को समझना होगा कि अब युवा रोजगार चाहता है, न कि भाषाई कट्टरता। (Language politics in India)



