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अंधविश्वास बना अभिशाप, इलाज के नाम पर अमानवीयता, मानसिक रोगी युवक को बेड़ियों में जकड़कर गांव में छोड़ा

Superstition in Surguja: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक घटना ने इलाज के नाम पर अंधविश्वास और अमानवीयता की हकीकत को उजागर कर दिया है। मामला जिले के अंबिकापुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित सुखरी गांव का है, जहां मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक को बैगा के झाड़फूंक के बाद लोहे की बेड़ियों में जकड़ कर छोड़ दिया गया। ग्रामीणों के मुताबिक युवक अंबिकापुर के पास किसी अन्य गांव का रहने वाला है। मानसिक बीमारी से जूझ रहे इस युवक को उसके परिजन इलाज के लिए सरकारी अस्पताल या मानसिक चिकित्सक के पास ले जाने की बजाय एक बैगा के पास ले गए।

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बैगा ने झाड़फूंक के बाद युवक के हाथ-पैर में लोहे की बेड़ियां डालकर उसमें ताले जड़ दिए और यही कहा गया कि अब बुरी आत्मा उस पर हावी नहीं होगी। स्थानीय लोगों की मानें तो युवक की मानसिक स्थिति काफी समय से बिगड़ी हुई थी। परिजनों ने पहले घरेलू उपाय किए, फिर किसी के कहने पर उसे सुखरी गांव के बैगा के पास लेकर पहुंचे। बैगा ने झाड़फूंक और तंत्र-मंत्र के नाम पर युवक के हाथ-पैर बांध दिए और कहा कि यह प्रक्रिया जरूरी है। अब युवक बेड़ियों के कारण दो कदम भी ठीक से चल नहीं पा रहा है। उसे न तो खुलकर चलने दिया जा रहा है और न ही किसी तरह की दवा दी जा रही है। गांव के खुले और पथरीली जमीन पर उसे बैठाकर छोड़ दिया गया है। (Superstition in Surguja)

मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन

यह मामला न सिर्फ अंधविश्वास की भयावहता को दर्शाता है, बल्कि यह मानवाधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 का भी खुला उल्लंघन है। इस अधिनियम के मुताबिक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को सम्मानजनक इलाज, गरिमा से जीने का अधिकार और बिना क्रूरता के इलाज पाने का पूरा अधिकार है। बेड़ियों में जकड़ना, ताले लगाना और खुले में छोड़ देना ये सभी कार्य गैरकानूनी और अपराध की श्रेणी में आते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव और अंधविश्वास के चलते कई ग्रामीण आज भी ऐसी ही उपचार पद्धतियों पर भरोसा कर रहे हैं। (Superstition in Surguja)

परिजन अभी भी बैगा के पास ही रुके हुए

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक युवक के परिजन सुखरी गांव में ही रुके हुए हैं और बैगा की निगरानी में ही झाड़फूंक की प्रक्रिया जारी है। परिजन का विश्वास है कि यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद युवक ठीक हो जाएगा। यह स्थिति तब है जब अंबिकापुर में मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मौजूद हैं, लेकिन उनके लाभ से लोग अभी भी वंचित हैं। घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बावजूद स्थानीय प्रशासन और पुलिस की ओर से अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं की गई है। यह स्थिति व्यवस्था की संवेदनहीनता और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी को दर्शाती है। (Superstition in Surguja)

आज भी वही सवाल-अंधविश्वास का अंत कब ?

यह कोई पहली घटना नहीं है। छत्तीसगढ़ और दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में अंधविश्वास के नाम पर क्रूरता की घटनाएं अक्सर सामने आती हैं। कभी डायन बताकर महिलाओं की हत्या तो कभी झाड़फूंक के नाम पर बीमार व्यक्तियों को प्रताड़ित करना। सरगुजा के इस मामले ने फिर से यह सोचने पर मजबूर किया है कि सरकारी योजनाएं, स्वास्थ्य सेवाएं और जन-जागरूकता अभियान आखिर गांवों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं ?

क्या कहता है कानून ?

मानसिक रोगी को किसी भी तरह की शारीरिक कैद में रखना अपराध की श्रेणी में आता है। भारत सरकार की ओर से पारित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 के तहत हर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को सम्मान और उपचार का अधिकार प्राप्त है।
बिना चिकित्सा सलाह के झाड़फूंक, तंत्र-मंत्र और शारीरिक कष्ट देना दंडनीय अपराध है।

समाज के नाम संदेश

यह घटना हम सबके लिए एक सामाजिक और नैतिक चेतावनी है। जब तक हम मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूक नहीं होंगे और अंधविश्वास को विज्ञान से नहीं बदलेंगे, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। लोगों ने प्रशासन से अपील कि है कि युवक को तत्काल चिकित्सकीय सहायता दी जाए। परिजनों को परामर्श और जागरूकता प्रदान की जाए। बैगा के खिलाफ विधिक कार्रवाई की जाए। ग्राम स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए जाएं। (Superstition in Surguja)

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