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रिश्वत का खेल, केस दबाने का सौदा: वायरल ऑडियो ने खोली पोल, सिटी कोतवाली के उप निरीक्षक सस्पेंड

गरियाबंद। सिटी कोतवाली में तैनात उप निरीक्षक अजय कुमार सिंह पर रिश्वत लेकर मामला दबाने का गंभीर आरोप सामने आते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए दो ऑडियो ने पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक नीरज चंद्राकर ने तत्काल कार्रवाई करते हुए उप निरीक्षक को निलंबित कर दिया।

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बताया जा रहा है कि यह मामला एक महिला पर हुए हमले से जुड़ा है, जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आए थे। आरोप है कि कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने पीड़ित परिवार पर ही प्रकरण दर्ज कर दिया और उसी केस को दबाने के नाम पर ₹10 हजार की रिश्वत ली गई।

पहला ऑडियो: पैसे लेने की बात, काम नहीं होने की शिकायत

वायरल पहले ऑडियो में प्रार्थी उप निरीक्षक से सीधे सवाल करता सुनाई देता है—“10 हजार मांगे थे, दे दिए, फिर भी काम नहीं हुआ, हमें अंदर जाना पड़ा।” इस पर उप निरीक्षक कथित तौर पर पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं कि पैसा उन्हें नहीं मिला, बल्कि “पूरा पैसा डीएसपी ने लिया है” और वही पूरा मामला देख रहे हैं। इस बातचीत में केस डायरी और कार्रवाई से जुड़ी अहम बातें भी सामने आती हैं, जो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं।

दूसरा ऑडियो: पैसे वापसी का भरोसा और ‘ऊपर’ तक लिंक

दूसरे ऑडियो में प्रार्थी की पत्नी से बातचीत सामने आई है, जिसमें उप निरीक्षक “नंदू जी” का जिक्र करते हुए फोटो लाने को कहते हैं। महिला जब 10 हजार रुपए वापस दिलाने की बात करती है, तो उप निरीक्षक कथित तौर पर कहते हैं—“आ जाओ, डीएसपी से मिलवा दूंगा, पैसा वहीं है, वापस दिलवा देंगे।” यह बातचीत सीधे तौर पर इस बात की ओर इशारा करती है कि मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि ऊपर तक पहुंचने की आशंका है।

पीड़ित बना आरोपी, न्याय की जगह सौदेबाजी का आरोप

सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस परिवार ने हमले की शिकायत की, उसी पर उल्टा केस दर्ज कर दिया गया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पहले मामला दर्ज न करने के लिए पैसे लिए गए, फिर पूरे प्रकरण को दबाने की कोशिश की गई। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

7 दिन में रिपोर्ट, जांच डीएसपी को सौंपी

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच की जिम्मेदारी उप पुलिस अधीक्षक को सौंपी गई है। उन्हें 7 दिनों के भीतर प्राथमिक जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जांच में कितनी सच्चाई सामने आती है और क्या कार्रवाई सिर्फ निलंबन तक सीमित रहेगी या और बड़े नाम भी सामने आएंगे।

फिलहाल, वायरल ऑडियो ने पुलिस विभाग की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। सस्पेंशन की कार्रवाई भले ही त्वरित रही हो, लेकिन असली परीक्षा अब निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई की है।

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