Trending

Amla Navami Vrat शुक्रवार 12 नवम्बर 2021 : आंवला नवमी, ब्रह्मा के आंसुओं से उत्पन्न वृक्ष पर करते हैं निवास ब्रह्मा विष्णु महेश, मिलती हैं लक्ष्मी की कृपा, पढ़ें पूजा विधि व पौराणिक कथा

Whatsaap Strip

Amla Navami Vrat शुक्रवार 12 नवम्बर 2021 : आंवला नवमी, अक्षय नवमी। आरोग्य दिन एवं युग आदि तिथि विशेष महत्वपूर्ण दिन है। देवी पुराण एवं एवं हेमाद्री ग्रंथ में अत्यंत महत्व उल्लेखित है। आज गिफ्ट डे, हेल्थ डे, आंवला ट्री डे भी हैं। (आलेख पंडित वी. के. तिवारी – ज्योतिषाचार्य)

आंवला वृक्ष की उत्पत्ति 

आंवले को धातृ वृक्ष भी कहते हैं। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को प्रिय  है। सृष्टि वृक्षों में  सबसे पहले आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ था। इसलिए इसे आदिरोह या आदि वृक्ष भी कहा जाता है। शिवजी (Lord Shiva) के आंसूओं से रुद्राक्ष की उत्पत्ति, ब्रम्हा जी (Lord Brahma) के आंसूओं से आंवले के पेड़ की उत्पत्ति हुई। पद्म पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार, जब पूरी पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तब ब्रम्हा जी पुन: सृष्टि के लिए कमल पुष्प पर बैठकर ब्रम्हा जी परब्रम्हा की तपस्या करने लगे। परब्रम्हा भगवान विष्णु प्रकट हुए उनको देख कर ख़ुशी में के आंसू भगवान विष्णु के चरणों पर गिरे। इन  आंसूओं से आमलकी यानी आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ।

भगवान विष्णु- ब्रम्हा जी से कहा कि आपके आंसूओं से उत्पन्न आंवले का वृक्ष और फल मुझे हमेशा प्रिय रहेगा. हर वर्ष  कार्तिक मास की नवमी को आंवले के वृक्ष की, जो पूजा करेगा उसके सारे पाप समाप्त हो जाएंगे और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होगी। आंवले के पत्ते, फल और वृक्ष में श्रीहरी का वास भगवान विष्णु और शिव निवास करते हैं इसलिए इस दिन स्नान, पूजन, तर्पण और अन्नदान से कई गुना फल मिलता है।

यह भी पढ़ें : पांडव पंचमी मंगलवार 9 नवम्बर 2021 : पांडव पंचमी की जन्म पर्व कथा, किसने दिया था श्राप, पढ़ें यह लेख

आंवला नवमी व्रत (Amla Navami Vrat) पौराणिक कथा

माता लक्ष्मी एक बार पृथ्वीलोक पर भ्रमण के लिए आईं. यहां आकर उन्हें भगवान विष्णु और शिव की पूजा एक साथ करने  की इच्छा हुई। ऐसे में उन्हें ध्यान आया कि तुलसी और शिव के स्वरुप बैल के गुण आंवले के वृक्ष में होते है। इसमें दोनों का अंश है, इसलिए मां लक्ष्मी ने आंवले को ही शिव और विष्णु का स्वरूप मानकर पूजा की थी। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर दोनों देव एक साथ प्रकट हुए।  लक्ष्मी जी ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु जी और भगवान शिव को खिलाया। इसलिए सुख, समृद्धि और सौभाग्य के लिए आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।

आंवला नवमी व्रत (Amla Navami Vrat) का महत्व

पद्म पुराण के अनुसार, कार्तिकेय से भगवान शिव से कहा था कि आंवला वृक्ष साक्षात विष्णु का ही स्वरूप है। ऐसे में यह वृक्ष विष्णु प्रिय है। व्रत से पूजा से गोदान के बराबर का फल प्राप्त होता है। आंवले के वृक्ष को स्पर्श मात्र से ही दोगुना तथा फल सेवन पर तीन गुना फल प्राप्त होता है। इस दिन व्रत पूजा तर्पण एवं अन्न दान का अनंत गुना फल प्राप्त होता है। युग प्रारंभ की तिथि भी है।

इस प्रकार इस दिन गाय, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण, अन्न का दान करने का विशेष प्रभाव होता है। यह उच्च पद, प्रतिष्ठा, नगर प्रमुख, प्रदेश प्रमुख एवं सर्व विधि विजय प्रदान करता है। कोर्ट केस, विवाद,चुनाव विजय, निलंबन समाप्ति, रोजगार प्राप्ति में भी सहायक है।

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष नवमीधात्री या इसका नाम धात्री नवमी अर्थात धात्री आंवला वृक्ष को कहते हैं। आंवला वृक्ष की पूजा होती है। दूसरा नाम इसका कुष्मांड नवमी भी है। महिला संतान प्राप्ति के लिए और संतान की‌ शुभकामनाओं के लिए आंवले के पेड़ की पूजा करती है उसकी इच्छाओं को भगवान शिव और विष्णु जरूर पूरा करते हैं।

आंवला नवमी व्रत (Amla Navami Vrat) पूजा विधि 

पूजा से अन्न दोष से मुक्ति मिलती है। आंवला वृक्ष न मिले तो गमले में वृक्ष नर्सरी से ले लिजिये। या उसकी शाखा भी प्रयोग कर सकते हैं।

  •  आंवला वृक्ष के नीचे बैठकर, पूर्व दिशा की ओर मुंह करके आंवला वृक्ष की पूजा करने का विधान है।
  •  ॐ धात्री देवी आपको नमन। गंध पुष्प जो भी सुलभ हो वे आंवला वृक्ष को अर्पित करना चाहिए।
  •  आंवला वृक्ष की जड़ पर दूध छोड़े।
  • मंत्र बोलें : पिता पिता महाशच अन्ये अपुत्रा  ये च गोत्रीण:। ते पिबंतू मया दत्तम धात्री मूले अक्षयम पय:। आब्रहम स्तंब पर्यांत्म देव ऋषि मानव:। ते पिबंतू मया दत्तम धात्री मूले अक्षयम पय:।
  •  इस मंत्र को बोलते हुए आंवले की जड़ में दूध की धारा या दूध छोड़ना चाहिए।
  •  इसके पश्चात कहे कि, भगवान दामोदर आपके समीप रहते हैं। है धात्री देवी आपको नमस्कार। आपको धागा अर्पित करते हुए लपेटती हूं, आपको नमस्कार।
  •  इस प्रकार 5, 11, 108 बार (इच्छानुसार) वृक्ष के तने में धागा लपेटिए।
  •  प्रदक्षिणा करने का भी विधान है।
  •  मंत्र – यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।
  •  जड़ में दूध अर्पण।
  •  इसके पश्चात आमले की कपूर, दीपक जिसमें चार बत्ती (लाल पीली रंग की बत्ती हो। श्वेत रंग की नहीं या कलावा मौली काट कर बना ले।) से आरती व पूजा करना चाहिए।
  •  गाय घी, महुआ तैल, तिल तैल विशेष उपयोगी माना गया है।
  •  इस दिन आंवला जरूर खाएं।

यह भी पढ़ें : गोपा अष्टमी गुरुवार 11 नवम्बर 2021 : गौ पालकों का पर्व, गौ-शाला का महोत्सव दिवस, पढ़े यह पौराणिक कथा

आज के ही दिन हुआ था  द्वापर युग प्रारम्भ 

द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था, जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। आंवला नवमी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन-गोकुल छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था।

कथा – दान कर्म ही सुख का वरदान

एक राजा था, उसने प्रण किया हुआ था। वह रोज सवा मन आंवले दान करके ही खाना खाता था। इससे उसका नाम आंवलया राजा पड़ गया। एक दिन उसके बेटे बहु ने सोचा कि राजा इतने सारे आंवले रोजाना दान करते हैं, इस प्रकार तो एक दिन सारा खजाना खाली हो जायेगा। इसीलिए बेटे ने राजा से कहा की उसे इस तरह दान करना बंद कर देना चाहिए।

बेटे की बात सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और राजा रानी महल छोड़कर बियाबान जंगल में जाकर बैठ गए। राजा-रानी आंवला दान नहीं कर पाए और प्रण के कारण कुछ खाया नहीं। जब भूखे प्यासे सात दिन हो गए तब भगवान ने सोचा कि यदि मैने इसका प्रण नहीं रखा और इसका सत नहीं रखा तो विश्वास चला जाएगा। इसलिए भगवान ने, जंगल में ही महल, राज्य और बाग-बगीचे सब बना दिए और ढेरों आंवले के पेड़ लगा दिए।

सुबह राजा रानी उठे तो देखा की जंगल में उनके राज्य से भी दुगना राज्य बसा हुआ है। राजा, रानी से कहने लगे, सत मत छोड़े। सूरमा सत छोड़या पत जाए, सत की छोड़ी लक्ष्मी फेर मिलेगी आए। राजा-रानी ने आंवले दान करके खाना खाया और खुशी-खुशी जंगल में रहने लगे। उधर आंवला देवता का अपमान करने व माता-पिता से बुरा व्यवहार करने के कारण बहु बेटे के बुरे दिन आ गए।

राज्य दुश्मनों ने छीन लिया दाने-दाने को मोहताज हो गए और काम ढूंढते हुए अपने पिताजी के राज्य में आ पहुंचे। उनके हालात इतने बिगड़े हुए थे कि पिता ने उन्हें बिना पहचाने हुए काम पर रख लिया। बेटे-बहु ने भी अपने माता-पिता को नहीं पहचाना। एक दिन बहु ने सास के बाल गूंथते समय उनकी पीठ पर मस्सा देखा। उसे यह सोचकर रोना आने लगा की ऐसा मस्सा मेरी सास के भी था। हमने ये सोचकर उन्हें आंवले दान करने से रोका था कि हमारा धन नष्ट हो जाएगा। आज वे लोग न जाने कहां होगे?

यह सोचकर बहु रोने लगी और आंसू टपक टपक कर सास की पीठ पर गिरने लगे। रानी ने तुरंत पलट कर देखा और पूछा कि, तू क्यों रो रही है? उसने बताया आपकी पीठ जैसा मस्सा मेरी सास की पीठ पर भी था। हमने उन्हें आंवले दान करने से मना कर दिया था इसलिए वे घर छोड़कर कहीं चले गए। तब रानी ने उन्हें पहचान लिया। सारा हाल पूछा और अपना हाल बताया। अपने बेटे-बहू को समझाया कि दान करने से धन कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। बेटे-बहु भी अब सुख से राजा-रानी के साथ रहने लगे। हे भगवान, जैसा राजा रानी का सत रखा वैसा सबका सत रखना। कहते-सुनते सारे परिवार का सुख रखना।

दूसरी कथा : आंवला नवमी, शंकराचार्य की कथा

एक बार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगने एक कुटिया के सामने रुके। वहां एक बूढ़ी औरत रहती थी, जो अत्यंत गरीबी थी। शंकराचार्य की आवाज सुनकर वह बूढ़ी औरत बाहर आई। उसके हाथ में एक सूखा आंवला था। वह बोली महात्मन मेरे पास इस सूखे आंवले के सिवाय कुछ नहीं है जो आपको भिक्षा में दे सकूं।

शंकराचार्य को उसकी स्थिति पर दया आ गई और उन्होंने उसी समय उसकी मदद करने का प्रण लिया। उन्होंने अपनी आंखें बंद की और मंत्र रूपी 22 श्लोक बोले। ये 22 श्लोक कनकधारा स्तोत्र के श्लोक हैं।

प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए और कहा कि शंकराचार्य, इस औरत ने अपने पूर्व जन्म में कोई भी वस्तु दान नहीं की। यह अत्यंत कंजूस थी इसलिए इस जन्म में इसकी यह हालत हुई है। यह अपने कर्मों का फल भोग रही है इसलिए मैं इसकी कोई सहायता नहीं कर सकती।

शंकराचार्य ने देवी लक्ष्मी की बात सुनकर कहा- हे महालक्ष्मी इसने पूर्व जन्म में अवश्य दान-धर्म नहीं किया है, लेकिन इस जन्म में इसने पूर्ण श्रद्धा से मुझे यह सूखा आंवला भेंट किया है। इसके घर में कुछ नहीं होते हुए भी इसने यह मुझे सौंप दिया। इस समय इसके पास यही सबसे बड़ी पूंजी है, क्या इतना भेंट करना पर्याप्त नहीं है। शंकराचार्य की इस बात से देवी लक्ष्मी प्रसन्न हुई और उसी समय उन्होंने गरीब महिला की कुटिया में स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी।

तीसरी कथा : वैधव्य योग नाशक वृक्ष पूजा

किशोरी नामक कन्या की जन्मकुंडली में वैधव्य योग रहता है। अक्षय नवमी को वह किशोरी तुलसी का व्रत करती है। पीपल, तुलसी का पूजन करती है। विलेपी नामक युवक किशारी से प्रेम करता है एवं किशोरी का स्पर्श होते ही उसकीमृत्यु हो जती  है। इधर राजकुमार मुकुंद किशोरी को प्राप्त करने का वरदान सूर्य से प्राप्त करता है। ईश्वर का लिखा (भाग्य) भी पूरा हो जाता है। वैधव्य योग भी पूर्ण होकरमुकुंद को पत्नी रूप में किशोरी प्राप्त हो जाती है।

चौथी कथा सन्तान प्रद वृक्ष 

काशी नगर में निसंतान वैश्य रहता था। यह‌ दंपत्ति संतान की प्राप्ति के लिए अनेकों प्रयास कर चुके थे । एक दिन वैश्य की पड़ोसन ने उसकी बीवी को एक उपाय बताया। उसकी पड़ोसन ने कहा कि एक बालक की बली भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी। वैश्य की पत्नी ने जब यह बात अपने पति से बताया तो उसने इस बात को सीधा नकार दिया। फिर उस वैश्य की पत्नी किसी पराए बालक की बलि देने के लिए सही समय का इंतजार करने लगी। सही मौका मिलने पर उसने एक लड़की को कुएं के अंदर गिरा दिया और भैरव के नाम से बली दे दी। उसने धर्म की जगह अधर्म किया इसीलिए उसके पूरे बदन में कोढ़ हो गया।

जब यह बात वैश्य को पता चली तो उसने बोला गोवध, ब्राह्मण वध और बाल वध करना अधर्म है। इस कष्ट से छुटकारा पाने के लिए गंगा की शरण में जाना उचित होगा। अपने पति की बात मानकर वह गंगा मां के शरण में गई।

गंगा मैया ने फिर वैश्य की पत्नी को कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन आंवले के पेड़ का पूजन और आंवले का सेवन करने के लिए कहा। वैश्य की पत्नी ने ठीक वैसा ही किया और वह इस कष्ट से मुक्त हो गई।‌ यह व्रत और पूजा करने से उसे कुछ दिनों बाद संतान की प्राप्ति हुई।

आदिगुरु शंकराचार्य जी ने की थी कनकधारा स्रोत

कनकधारा स्तोत्र वर्ष में सर्वाधिक महत्व आवला नवमी को पढने का हैं। रचना आदिगुरु शंकराचार्य जी ने की थी। कनकधारा का अर्थ होता है स्वर्ण की धारा, कहते हैं कि इस स्तोत्र के द्वारा माता लक्ष्मी को प्रसन्न करके उन्होंने सोने की वर्षा कराई थी। सिद्ध मंत्र होने के कारण कनकधारा स्तोत्र का पाठ शीघ्र फल देनेवाला और दरिद्रता का नाश करनेवाला है।

॥ श्री कनकधारा स्तोत्र ॥

अङ्ग हरेः पुलकभूषणम आश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुल आभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥

अर्थ :– जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल के पेड़ का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ती रहती है तथा जिसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, वह सम्पूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी की कटाक्षलीला मेरे लिए मंगलदायिनी हो।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥2॥

अर्थ :– जैसे भ्रमरी महान कमलदल पर आती-जाती या मँडराती रहती है, उसी प्रकार जो मुरशत्रु श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बारंबार प्रेमपूर्वक जाती और लज्जा के कारण लौट आती है, वह समुद्रकन्या लक्ष्मी की मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन-सम्पत्ति प्रदान करे।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम
आनन्दहेतुर अधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध –
मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥

अर्थ :– जो सम्पूर्ण देवताओं के अधिपति इन्द्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मुरारि श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनन्द प्रदान करनेवाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, वह लक्ष्मीजी के अधखुले नयनों की दृष्टि क्षणभर के लिए मुझपर भी थोड़ी सी अवश्य पड़े।

आमीलिताक्षम अधिगम्य मुदा मुकुन्दम
आनन्दकन्दमनिमेषमन अङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्ग आनायाः ॥4॥

अर्थ :– शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मीजी का वह नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला हो, जिसकी पुतली तथा भौं प्रेमवश हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष नयनों से देखनेवाले आनन्दकन्द श्रीमुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणम आवहतु मे कमला आलयायाः ॥5॥

अर्थ :– जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि मण्डित वक्षस्थल में इन्द्रनीलमयी हारावली सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करनेवाली है, वह कमलकुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।

कालाम्बुद अलिललितोरसि कैटभारे –
र्धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति –
र्भद्राणि मे दिशतु भार्गव आनन्दनायाः ॥6॥

अर्थ – जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के समान श्यामसुन्दर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती हैं, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनन्दित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी हैं, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीया मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥7॥

अर्थ – समुद्रकन्या कमला की वह मन्द, अलस, मन्थर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहाँ मुझपर पड़े।

दद्याद् दया अनुपवनो द्रविण अम्बुधारा –
मस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयन अम्बुवाहः ॥8॥

अर्थ – भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्ररूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्मरूपी घाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद में पड़े हुए मुझ दीनरूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करे।

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र –
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्टकमल उदरदीप्ति अरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥9॥

अर्थ – विशिष्ट बुद्धिवाले मनुष्य जिनके प्रीतिपात्र होकर उनकी दयादृष्टि के प्रभाव से स्वर्गपद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं पद्मासना पद्मा की वह विकसित कमल गर्भ के समान कान्तिमती दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करे।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥10॥

अर्थ – जो सृष्टि-लीला के समय ब्रह्मशक्ति के रूप में स्थित होती हैं, पालन-लीला करते समय वैष्णवी शक्ति के रूप में विराजमान होती हैं तथा प्रलय-लीला के काल में रुद्रशक्ति के रूप में अवस्थित होती हैं, उन त्रिभुवन के एक मात्र गुरु भगवान नारायण की नित्ययौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुण अर्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥11॥

अर्थ – हे माता ! शुभ कर्मों का फल देनेवाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिन्धुरूप रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमलवन में निवास करनेवाली शक्तिस्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुरुषोत्तमप्रिया पुष्टि को नमस्कार है।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥12॥

अर्थ – कमलवदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिन्धु सम्भूता श्रीदेवी को नमस्कार है। चन्द्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरण उद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥13॥

अर्थ – कमलसदृश नेत्रोंवाली माननीया माँ ! आपके चरणों में की हुई वन्दना सम्पत्ति प्रदान करनेवाली, सम्पूर्ण इन्द्रियों को आनन्द देनेवाली, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत है। मुझे आपकी चरणवन्दना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
संतनोति वचनाङ्गमानसै –
स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥14॥

अर्थ – जिनके कृपाकटाक्ष के लिए की हुई उपासना उपासक के लिए सम्पूर्ण मनोरथों और सम्पत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मीदेवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूँ।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतम अंशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥15॥

अर्थ – भगवति हरिप्रिये ! तुम कमलवन में निवास करनेवाली हो, तुम्हारे हाथों में लीलाकमल सुशोभित है। तुम अत्यन्त उज्ज्वल वस्त्र, गन्ध और माला आदि से शोभा पा रही हो। तुम्हारी झाँकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली देवि ! मुझपर प्रसन्न हो जाओ।

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट –
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष –
लोकाधिनाथगृहिणीम अमृताब्धिपुत्रीम् ॥16॥

अर्थ – दिग्गजों द्वारा सुवर्ण कलश के मुख से गिराये गये आकाशगंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्रीअंगों का अभिषेक किया जाता है, सम्पूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रातःकाल प्रणाम करता हूँ।

कमले कमलाक्षवल्लभे
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्‌गैः।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥17॥

अर्थ – कमलनयन केशव की कमनीय कामिनी कमले ! मैं अकिंचन ( दीनहीन ) मनुष्यों में अग्रगण्य हूँ, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूँ। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरल तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभावित आशयाः ॥18॥

अर्थ – जो लोग इन स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयीस्वरूपा त्रिभुवनजननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यन्त सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभाव को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।

॥ श्रीमत् शंकराचार्य रचित कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

 

Related Articles