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बस्तर में नक्सलवाद की टूटी कमर, हथियारों की रिकवरी जारी, 6 संगठनों पर बैन बढ़ा

Back Broken of Naxalism: छत्तीसगढ़ का बस्तर पिछले साढ़े चार दशक से ज्यादा समय तक नक्सलवाद की चपेट में रहा, जो अब एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कभी नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले इस इलाके में अब उनके सबसे घातक सैन्य ढांचे PLGA यानी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है। सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाई और रणनीतिक ऑपरेशनों के चलते नक्सलियों की ताकत लगातार कमजोर हुई है। बस्तर में नक्सलियों के पास एक समय भारी मात्रा में लूटे गए और अत्याधुनिक हथियार मौजूद थे। इनमें AK-47, INSAS, SLR, BGL और LMG जैसे हथियार शामिल थे, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।

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सुरक्षाबल न सिर्फ मुठभेड़ों में हथियार बरामद कर रहे हैं, बल्कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली भी अपने हथियार सौंप रहे हैं। इसके साथ ही अंदरूनी इलाकों में छिपाकर रखे गए हथियारों की खोज और बरामदगी भी तेजी से जारी है। प्रदेश गठन के बाद से अब तक बस्तर में करीब 3500 से ज्यादा हथियार बरामद किए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा हथियारों की रिकवरी साल 2025 में हुई। आंकड़ों के मुताबिक 2020 में 89, 2021 में 80, 2022 में 61, 2023 में 35, 2024 में 286, 2025 में 677 और साल 2026 में अब तक 316 हथियार बरामद किए जा चुके है। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि नक्सलियों का हथियार नेटवर्क तेजी से टूट रहा है।

कहां से आते थे हथियार ?

जानकारों के मुताबिक नक्सलियों के पास अधिकांश हथियार लूट के जरिए पहुंचे थे। ओडिशा के कोरापुट जिला मुख्यालय में 2004 में नक्सलियों ने शस्त्रागार को लूटा था। इसके बाद बस्तर में बड़ी वारदातों को अंजाम देने के बाद शहीद जवानों से भी बड़ी मात्रा में हथियारों की लूट की गई थी, जिनमें 2007 में रानीबोदली, 2010 में ताड़मेटला कांड शामिल हैं। इन बड़ी घटनाओं के बाद शहीद जवानों से हथियार लूटे गए थे। इसके अलावा नक्सलियों ने खुद की फैक्ट्रियों में देसी हथियार जैसे कट्टा, सिंगल शॉट गन और BGL भी तैयार किए। जबकि अवैध तस्करी के जरिए भी नक्सलियों तक बड़ी मात्रा में हथियार पहुंचे थे। (Back Broken of Naxalism)

6 संगठनों पर बढ़ा बैन, सरकार सख्त

छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल गतिविधियों पर लगाम कसते हुए कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े 6 फ्रंट संगठनों पर प्रतिबंध को एक साल के लिए बढ़ा दिया है। यह आदेश 12 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो चुका है। यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 के तहत की गई है। सरकार का मानना है कि ये संगठन राज्य की सुरक्षा, शांति और संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरा बन रहे हैं। प्रतिबंधित संगठनों में दण्डकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ, क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, क्रांतिकारी आदिवासी बालक संघ, क्रांतिकारी किसान कमेटी, महिला मुक्ति मंच और आरपीसी (जनताना सरकार) शामिल हैं।

महिला भर्ती और शहरी विस्तार पर फोकस

क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ जैसे संगठन नक्सली विचारधारा को फैलाने और महिला कैडर भर्ती में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। ये संगठन अब ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे। आरपीसी या जनताना सरकार को नक्सलियों की समानांतर शासन व्यवस्था माना जाता है। यह संगठन प्रभावित इलाकों में अदालतें चलाता है। टैक्स वसूली करता है। प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने की कोशिश करता है। सरकार के मुताबिक यह सीधा-सीधा लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देता है और विकास कार्यों में बाधा डालता है। (Back Broken of Naxalism)

क्यों बढ़ाया गया प्रतिबंध ?

सरकारी अधिसूचना के अनुसार संगठन ग्रामीण के साथ शहरी नेटवर्क बढ़ा रहे थे। सार्वजनिक शांति को खतरा पैदा हो रहा था। सरकारी कामकाज में बाधा डाली जा रही थी। इन्हीं कारणों से प्रतिबंध को जारी रखना जरूरी समझा गया। डिप्टी CM अरुण साव ने साफ कहा कि सरकार का अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2026 तक लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन अगर कोई भी छिपा या बचा है तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा। बस्तर में शांति बहाली तक अभियान जारी रहेगा। बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है, जहां एक ओर नक्सलियों का सैन्य ढांचा और हथियार कमजोर पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार संगठनों के नेटवर्क को भी खत्म करने में जुटी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि बस्तर पूरी तरह शांति और विकास की राह पर कितनी तेजी से आगे बढ़ता है।

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