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आने वाले समय में ऊर्जा संकट की बढ़ती संभावनाएं, दस्तक दे रही देश में बढ़ती महंगाई की समस्या

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न्यूज डेस्क : सर्दियों का सीजन शुरू होने से पहले वैश्विक ऊर्जा संकट और मांग में वृद्धि ने एक खतरे की घंटी बजा दी है। पहले से ही ऊर्जा संकट दुनिया के सामने खड़ा है और यह आगे आने वाले दिनों में और गंभीर हो सकता है, क्‍योंकि सर्दियों में घरों में रोशनी और गर्मी के लिए अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। दुनिया की तमाम सरकारें ऊर्जा संकट की वजह से उपभोक्‍ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को सीमित करने की भरसक कोशिश कर रही हैं, लेकिन उनका यह भी कहना है कि वे कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने में सक्षम नहीं हैं।

नागरिकों के लिए बिजली कटौती पहले से ही शुरू हो चुकी है, जबकि भारत में बिजली संयंत्र कोयले की कमी से जूझ रहे हैं। यूरोप में उपभोक्‍ताओं के वकील पुराना बकाया न चुकाने पर कनेक्‍शन काटने पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। एशिया महाद्वीप में अकेला चीन ही ऊर्जा संकट का सामना नहीं कर रहा है। भारत में भी अगले कुछ दिनों में बिजली की कमी पैदा हो सकती है, क्‍योंकि अधिकांश थर्मल पावर प्‍लांट्स में कोयले का भंडार गंभीर निचले स्‍तर पर पहुंच गया है।

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भारत की स्थिति

एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था भारत में 135 थर्मल पावर प्‍लांट्स हैं, जिनमें से 63 के पास दो दिन या इससे कम का कोयला भंडार बचा है। 17 पावर प्‍लांट्स के पास कोयले का भंडार बिल्‍कुल समाप्‍त हो चुका है। 75 प्‍लांट्स के पास 5 दिन का कोयला भंडार है। भारत में कुल बिजली उत्‍पादन में थर्मल पावर प्‍लांट्स की हिस्‍सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है।

प्राकृतिक गैस की बढ़ी कीमत

यूरोप में, प्राकृतिक गैस की कीमत 230 डॉलर प्रति बैरल पर है। सितंबर की शुरुआत से इसकी कीमत में 130 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जबकि पिछले साल की समान अवधि की तुलना में यह वृद्धि आठ गुना अधिक है। ईस्‍ट एशिया में प्राकृतिक गैस की कीमत सितंबर की शुरुआत के बाद से अबतक 85 प्रतिशत बढ़ चुकी है और अभी यह 204 डॉलर प्रति बैरल पर है। प्राकृतिक गैस की अधिक कीमत की वजह से कोयले और तेल की कीमत भी बढ़ रही है, क्‍योंकि कुछ मामलों में इन्‍हें अन्‍य विकल्‍प के रूप में इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

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केंद्रीय बैंक और निवेशक परेशान

ये हालात तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों और निवेशकों को परेशान कर रहे हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें मुद्रास्फीति को बढ़ाने में योगदान दे रही हैं, जो पहले से ही एक प्रमुख चिंता का विषय है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था कोविड-19 के सुस्त प्रभावों को दूर करने की कोशिश कर रही है। सर्दियों में ऊर्जा मांग में वृद्धि इस मामले को और खराब कर सकती है।

समाधान नहीं आसान

सारा संकट ऊर्जा की बढ़ती मांग की वजह से है, क्‍योंकि महामारी के बाद आर्थिक सुधार तेजी से हो रहा है। इस साल असामान्‍य रूप से लंबी और अत्‍यधिक ठंडी सर्दी ने यूरोप में प्राकृतिक गैस के भंडार को कम कर दिया है। ऊर्जा की बढ़ती मांग ने पुनर्भरण प्रक्रिया को बाधित कर दिया है, जो आमतौर पर वसंत और गर्मियों में होती है।

ऊर्जा संकट से तेल कीमतों को भी समर्थन

प्राकृतिक गैस की कीमत अगस्‍त की शुरुआत के बाद से 47 प्रतिशत बढ़ चुकी है। कोयले की कम मांग ने भी प्राकृतिक गैस की कीमतों को बढ़ाने में योगदान दिया है क्‍योंकि अधिकांश यूरोपियन कंपनियों को कोयला जलाने के लिए कार्बन क्रेडिट के लिए भुगतान करना होता है। ऊर्जा संकट से तेल कीमतों को भी समर्थन मिल रहा है।

संकट बढ़ाएगा कीमत

आगे आने वाले महीनों में खराब मौसम से तनाव और पैदा होगा। विशेषकर उन देशों में जो बिजली उत्‍पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जैसे इटली और यूके। ब्रिटेन में और भी कठिन स्थिति है क्‍योंकि इसके पास भंडारण क्षमता की कमी है और यह फ्रांस के साथ टूटी हुई बिजली लाइन से होने वाले नुकसान से पहले ही जूझ रहा है।

महंगाई बढ़ने का डर

बिजली कीमत में बहुत अधिक वृद्धि से महंगाई बढ़ने का भी डर है। जो पहले से ही नीति निर्माताओं को अपने अगले कदम पर सावधानीपूर्वक विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है। विकासशील देशों में अगस्‍त के दौरान बिजली की कीमत में 18 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। 2008 के बाद यह सबसे तेज वृद्धि है। बिजली की ऊंची कीमत कपड़ों या बाहर खाना खाने जैसे उपभोक्‍ता खर्च पर असर डाल सकती हैं। यदि उद्योगों को बिजली बचाने के लिए अपनी गतिविधियों में कटौती करने के लिए कहा जाता है तो इससे भी अर्थव्‍यवस्‍था को नुकसान पहुंचेगा।

जबकि करीब आधे 72 पावर प्लांट के पास तीन दिन से कम का कोयले का स्टॉक बचा है. बाकी पावर प्लांट के पास एक हफ्ते से भी कम कोयले का स्टॉक है. जान लें कि भारत में 70 फीसदी बिजली कोयले से ही बनाई जाती है. बिजली बनाने में भारत का 75 प्रतिशत कोयला लग जाता है. कोयले से बनी बिजली सस्ती पड़ती है।

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पावर प्लांट में क्यों हुई कोयले की कमी?

दरअसल कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बाद इंडस्ट्रियल पावर की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ गई है. इसकी वजह से कोयले की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ा गैप आ गया है। इसी वजह कोयले के आयात (Import Of Coal) पर काफी असर पड़ा है। कोल इंडिया (COAL.NS) के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत बढ़ने से पावर प्लांट ने आयात होने वाले कोयले पर निर्भरता कम कर दी है। जिसकी वजह से भारत में मौजूद कोयले की खदानों पर खनन को लेकर दबाव बढ़ गया है।

अतंरराष्ट्रीय बाजार से भारत का कोयला सस्ता क्यों?

जान लें कि कोल इंडिया भारत में खदानों से निकाले जाने वाले कोयले की कीमत तय करता है। कोयले की कीमत बढ़ने का असर सीधे बिजली की कीमतों और अन्य सामानों पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत बढ़ने के बावजूद पिछले कई साल से कोयले की कीमत में कोल इंडिया ने ज्यादा इजाफा नहीं किया है।

भारत में कोयले से बिजली बनाने वाले पावर प्लांट इस वक्त कोयले की कमी (Coal Shortage In India) से जूझ रहे हैं।सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (Central Electricity Authority) के अनुसार, भारत के कोयला से बिजली बनाने वाले 135 पावर प्लांट (Coal Fired Power Plants) में से 16 के पास कोयले का स्टॉक पूरी तरह से खत्म हो गया है।

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