Google Analytics —— Meta Pixel
Trending

श्राद्ध (पितर) पक्ष : श्राद्ध पक्ष पर आधारित एक पौराणिक कथा, जानें पितरों ने कैसे दिया अपना आशीर्वाद

श्राद्ध (पितर) पक्ष : श्राद्ध कथा (श्रद्धा से किया कर्म पितरों को तृप्ति देता है) इसी से जुड़ी है श्राद्ध पक्ष की पौराणिक कथा, जानते हैं कि कैसे श्रद्धा भाव से प्रसन्न होकर पितर अपना आशीर्वाद देते हैं।

पौराणिक कथा : 

कथा के अनुसार, जोगे और भोगे नाम के दो भाई थे। दोनों भाई एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। जोगे के पास धन की कोई कमी न थी, लेकिन भोगे निर्धन था। जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, तो वहीं भोगे की पत्नी सुशील और शांत स्वाभाव की थी। पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य कह कर टाल मटोल की। जोगे की पत्नी को धनवान होने का अभिमान था। वह अपने धनिक होने का प्रदर्शन का ऐसा अवसर जाने नही देना चाहती थी। जोगे की पत्नी ने पति से कहा कि आप मुझे कोई कष्ट न हो इसलिए मना कर रहे हैं। मुझे कोई परेशानी नहीं होगी, मैं भोगे की पत्नी को अपनी सहायता के लिए बुला लूंगी।

यह भी पढ़ें : श्राद्ध (पितर)पक्ष : तिथि षष्ठी, सप्तमी को लेकर मतभेद, शास्त्रों के नियमानुसार यह हैं श्राद्ध तिथि, पढ़ें पूरी खबर

पितरों के लिए दी गई ‘अगियारी’

श्राद्ध के दिन भोगे की पत्नी के साथ उसने अनेक पकवान बनाए। भोगे की पत्नी सभी सहयोग करने के बाद, पितरों के तर्पण हेतु, अपने घर वापस आ गई। पितर जोगे के घर पधारे, तो देखा कि जोगे और ससुराल पक्ष के सभी लोग भोजन पकवान का आनंद ले रहे हैं। ये  देखकर पितर बहुत निराश उपेक्षा से दुखी हुए। उसके बाद उनके पितर भोगे के घर गए, तो अपने लिए (पितरों के)  ‘अगियारी’ दी गई है देख कर, पितर उसकी राख चाटते हैं। सारे पितर अपने-अपने यहां का श्राद्ध ग्रहण करके इकट्ठे हो कर संतान द्वारा श्राद्ध भोजन का वर्णन करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी घटना  बतायी।

यह भी पढ़ें : श्राद्ध (पितर) पक्ष : श्राद्ध पक्ष पर किस बात का रखें ध्यान, वह 24 बातें जो आप जानना चाहते हैं…पढ़ें पूरी खबर

नाच-नाचकर गाने लगे कि भोगे के घर धन हो जाए

पितरों ने विचार किया कि, भोगे निर्धन न होता तो उन्हें भूखा वापस नहीं आने पड़ता। ये सोचकर पितरों को भोगे पर दया आ गई। अचानक वे प्रसन्न होकर नाच-नाचकर गाने लगे कि भोगे के घर धन हो जाए, भोगे के घर धन हो जाए। भोगे के घर में खाने को दाना भी नहीं था। भूखे बच्चे अपनी मां से कह रहे थे कि भूख लगी है।

दुखी, विवश लाचार माँ ने गुस्से मे कहा  कि “जाओ आंगन में हौदी उल्टी रखी है, उसे सीधा कर लो, जो भी मिले  खा लो। बच्चे हौदी देख कर मां के पास जाकर कहते हैं कि मां हौदी में मोहरे है, खाने को कुछ नही। भोगे की पत्नी ने यह सुन कर दौड़ी-दौड़ी गयी, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। शीघ्र ही उसने भोगे को कह कर बच्चों को पकवान खिलाये। पितरों के आशीर्वाद से भोगे धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। अगले बरस पूरी श्रद्धा के साथ भोगे एवं उसकी पत्नी अपने पितरों का श्राद्ध किया। इससे उनके पितर बहुत प्रसन्न होते हैं।

आलेख : पंडित विजेन्द्र कुमार तिवारी – ज्योतिषाचार्य

पंडित वी. के. तिवारी

श्राद्ध (पितर) पक्ष पर आधारित यह छटवीं पौराणिक कथा हैं। 

Back to top button
error: Content is protected !!