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श्राद्ध (पितर) पक्ष : श्राद्ध पक्ष पर किस बात का रखें ध्यान, वह 24 बातें जो आप जानना चाहते हैं

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श्राद्ध (पितर) पक्ष : शिव प्रपितामह? किस ब्राह्मण को बुलाये? क्या नहीं खिलाये? किस बर्तन में खिलाये? पितर दोष से कैसे बचे? श्रेष्ठ श्राद्ध क्षेत्र? श्राद्ध (पितर) पक्ष से जुड़ीं सभी बातें जो आप जानना चाहते हैं। उन सभी बातों को पंडित विजेंद्र तिवारी ने विस्तार से बताया गया हैं। 

1. प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश होता है। इसलिए ईश्वर जनक या पिता के रूप में किस प्रकार माने गए हैं :

विश्व के पिता विष्णु हैं। महीनों को पिता माना गया है। पितामह ब्रह्मा, ऋतु को पितामह माना गया है। भगवान शिव को रूद्र को, प्रपितामह को माना गया है ।
जब तक पिंडदान ना हो जाए तब तक श्राद्ध कर्म में वर्जित है। (संदर्भ ग्रंथ विश्व प्रकाश हेमाद्री व्रत पराशर।)
भविष्य पुराण- श्राद्ध करता अनिरुद्ध, पिता प्रद्युम्न, पितामह संकर्षण ,प्रपितामह वासुदेव माने गए हैं।
प्रथम वरुण, दूसरे प्रजापति, तीसरे को अग्नि कहा गया है। (संदर्भ हेमाद्री नंदी पुराण।)

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2. किस वेद के ब्राह्मणों के लिए श्राद्ध में महत्व की, किस प्रकार की व्यवस्था है ?

यजुर्वेदीय को पिंडदान, ऋग्वेद को द्विज अर्चन अर्थात ब्राह्मण भोज, साम वैदियों को पिंड एवं ब्राह्मण अर्चन दोनों ही। श्राद्ध कर्म में संवेदी ब्राह्मण अधिक उपयुक्त हैं।(धर्म प्रदीप ग्रंथ में) श्रेष्ठ माने गए हैं। ब्राह्मणों ब्राह्मणों के चरण प्रक्षालन या झुलवा के समय पत्नी को दाहिनी ओर खड़े होकर जल छोड़ना चाहिए।

3 .श्राद्ध कर्म में कितने ब्राह्मण खिलाना चाहिए?

विषम (१, ३, ५, ७, ९) संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराने के निर्देश है।

4. पितर दोष या पितर कोप से बचने का सरल उपाय क्या है?

पितर दोष या पितरों कोप से बचने के लिए सबसे सरल विधि है – नियमित रूप से दक्षिण दिशा में मुंह कर “है पितरों प्रसन्न हो आशीर्वाद दे, सर्वसुख सफलता दीजिये।“ अंगूठे एवम तर्जनी के मध्य भाग से, हाथ में जल लेकर तीन बार छोड़ना चाहिए। इसके पश्चात पूर्व दिशा में मुंह कर देवताओं के लिए हथेली के अग्र भाग से जल छोड़ना चाहिए। एवं अंत में उत्तर दिशा की ओर मुंह कर ऋषियों के लिए सबसे छोटी उंगली के नीचे के भाग से जल छोड़े।

5. माता -पिता के श्राद्ध के लिए श्राद्ध तिथि को उपयुक्त समय शास्त्रोक्त क्या है?

माता के लिए शास्त्रोक्त नियम है – दोपहर पूर्व तक का समय श्राद्ध कार्य के लिए उत्तम है। पिता के लिए (dinmanka 8va bhaag) मध्यकाल का कुतुप काल लगभग 11:36 से 12::25 तक अति उत्तम इस अवधि में श्राद्ध कर्म प्रारंभ करना चाहिए एवं अधिक से अधिक रोहणी काल में अर्थात लगभग 2:00 बजे तक श्राद्ध कर्म पूर्ण कर लेना चाहिए।

6. किस दिन श्राद्ध करने के क्या फल होते हैं?

रविवार को श्राद्ध करने से आरोग्य प्राप्त होता है। सोमवार को सौभाग्य प्राप्त होता है। मंगलवार को शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। बुधवार को सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। गुरुवार को ज्ञान विद्या प्रतियोगिता क्षेत्र में सफलता मिलती है। शुक्रवार को धन और भौतिक सुख मिलते हैं शनिवार को श्राद्ध करने से आयु एवं आकस्मिक मृत्यु से सुरक्षा होती है।

7. वर्ष में श्राद्ध कर्म कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी तिथि छोड़कर कब करना उपयुक्त होता है ?

अमावस्या, हेमंत शिशिर ऋतु कि चारों अष्टमी, पुत्र जन्म के पश्चात, कृष्ण पक्ष में दक्षिणायन उत्तरायण में, मेष तुला संक्रांति में, व्यतिपात योग, चंद्र और सूर्य ग्रहण, कन्या कुंभ और वृषभ राशि के सुर में अमावस्या को माघ माघ तथा श्रावण माह की पूर्णिमा भाद्रपद महीने की पूर्णिमा के व्यतीत होने पर कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी।

8. भोजन किन पात्रों में रखा जा सकता है?

भोजन स्वर्ण एवं ताम्रपत्र है। चांदी के पात्र श्रेष्ठ हैं या लकड़ी के पात्र का भी प्रयोग कर सकते हैं। पीतल के पात्र, शीशे लाख के पात्र, स्टील का पात्र मिट्टी आदि के वर्जित हैं। कांसे का श्रेष्ठ है इसके अभाव में पलाश के पत्र अति उत्तम हैं। अन्यथा स्वर्ण, ताम्र और चांदी के भोजन पात्र भी प्रयोग किए जा सकते हैं। ब्रह्म पुराण में कांसे के पात्र को भी वर्जित बताया गया है।

9. श्राद्ध कार्य में किन वृक्षों के पत्ते उपयोग किए जा सकते हैं ?

पलाश, महुआ ,पीपल ,पारीका, कुरैया, पाकर, केतकी, केवड़ा ,आम ,कटहल ,जामुन, वट, नागकेसर, चंपा, परंतु केले का पत्ता वर्जित है।

10. जिनको अपने गोत्र का ज्ञान ना हो उनके लिए क्या व्यवस्था है ?

इस संदर्भ में गोत्र की अज्ञानता की स्थिति में व्याघ्र पाद मनीषी का वचन है एवं हिमाद्रि ग्रंथ में उल्लेख है की कश्यप गोत्र ही सर्व सामान्य का होता। कश्यप गोत्र ही सर्व सामान्य का होता।

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11. पुत्र का मरण कार्य एवम श्राद्ध पिता कर सकते हैं ?

छोटे भाइयों का श्राद्ध बड़ा भाई कर सकता है। पुत्र का मरण कार्य माता-पिता न करें। कनिष्ठ भाइयों का मृतक कार्य बड़ा भाई को नहीं करना चाहिए। बोधयन, कात्यायन द्वारा निषेध।

12. श्राद्ध के लिए किन ब्राह्मण को आमंत्रण देना वर्जित शास्त्रोक्त है ?

1- श्राद्ध कर्म में ऐसा कोई भी ब्राह्मण जो किसी कार्य के बदले धन प्राप्त करता होंवह वर्जित है।
2- जिस व्यक्ति के कोई अंग ना हो या अधिक अंग वाला हो।
3- जिसको कभी कुत्ते ने काटा हो ।
4- मंदिर का पुजारी, ज्योतिषि, चिकित्सक ।
5- आंध्र ,द्रविड़ ,कोकण ,कर्नाटक और कलिंग देश के ब्राह्मण।
6- नाचने गाने एवं संगीत से संबंधित वर्ग।
7- चोर , रोगी ,मूक बधिर, व्यसनी,जुआरी,शराबी,नशा वाला,3 उंगली से अधिक लंबे कान ।
8- पिता एवं पुत्र एक साथ ,सगे दो भाई, जिसकी पत्नी गर्भवती हो, समान गोत्र वाला ब्राह्मण श्राद्ध में वर्जित है।
श्राद्ध किन स्थानों पर अधिक फलदाई होता है कुरुक्षेत्र, गया, गंगा ,सोम तीर्थ , पुष्कर,ब
दरी, सरस्वती ,नदी नर्मदा गंगा और यमुना के किनारे जिंद के दक्षिण क्षेत्र की नदियां अमरकंटक पुलिंग हिमालय में गंगाद्वार बद्री क्षेत्र प्रयाग नैमिष पुष्कर आदि क्षेत्र मे अक्षय श्राद्ध माना जाता है महाफलदायी होता है।

13. श्राद्ध , पक्ष के समय खुले बाल वाली स्त्री यदि परिवार में होती है तो पितर निराश होकर चले जाते हैं । पद्म पुराण

गया श्राद्ध के बाद वार्षिक श्राद्ध पिंड दान करना चाहिए या नही?
उत्तर : गया श्राद्ध के बाद और भी आवश्यक पिंड दान है। यदि धन के अभाव मे संभव नही तो (करपात्री जी के निर्णय से) ब्राह्मण भोजन भी पिंड स्वरूप होता है।
श्राद्ध का अंतिम श्लोक जनार्दन:प्रियताम न मम।
अर्थात पितरों के लिया किया गया श्राद्ध ” विष्णु की प्रसन्नता के लिए करता हूं ”
अर्थात विष्णु जी(पिता) ब्रह्मा जी प्पितामह एवं शिवजी प्रपितामह होते हैं।

14. Tarpan कर्म मे पवित्री धारण नियम?

कुश /ड्सर्भ घास दे निर्मित अंगूठी को आकार को पवित्री कहते हैं ।ब्राह्मण (शिक्षक,प्रवचन,वेद,पुरान,)के लिए चार कुश पत्र वाली, क्षत्रियों (रक्षा,पुलिस,जेल,)के लिए तीन ,वेश्य (व्यापार) के लिए दो कुश का विधान हरीतग्रंथ में है। परंतु कम से कम 2 कुशा की पवित्री अति आवश्यक होती है। हेमाद्री स्कंद पुराण – बाय अनामिका उंगली में बहुत बहुत कुश हो या दो कुश वाली पवित्री धारण करें। दो कुश की पवित्री दाहिने हाथ में एवं बाएं हाथ में 3 कुश की पवित्रि। अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए। श्राद्ध कार्य के समय केवल दाहिनी अनामिका मे पवित्री पहने, वायें मे नही।

15. श्राद्ध के लिए लिंग एव्ं शालिग्राम का क्या महत्व है ?

जो लिंग या शालिग्राम शिला को पीठ पर स्थापित कर शादी करता है उसके पिता कल्प कोटि सो वर्ष तक स्वर्ग में निवास करते हैं।
पद्म पुराण के उत्तरखंड, धर्मसिंधु पृष्ठ 807।

15-श्राद्ध के कार्य में किस अन्न एवं वनस्पतियों का प्रयोग करना पितरों के लिए तृप्ति दायक होता है ?

काले तिल, गेहूं, उड़द, मूंग, पका हुआ भोजन, चना ,सावा ,सफेद सरसों ,बिना बोया चावल, केले, मूली, गाय का दूध, शहद, दही, आम विदारीकंद, मखाना, पेठा ,सिंघाड़ा, अरबी, सूरन, शहतूत, अखरोट, कटहल, खरबूजा, सरसों का साग, जामुन, चिरौंजी आमला, लोंग, इलाइची, केसर, मटर, अनार, सेधा नमक, शक्कर ,गुड ,कपूर, मुनक्का ,बेल फल, ककड़ी, हल्दी, लौकी महुआ, फालसा, मुनक्का, खीर,  चौलाई, बथुआ उपयोगी है।

16. श्राद्ध करने किन भोज्य पदार्थों को त्याग करना आवश्यक माना गया है?

निर्गुंडी, सहजन, पालक, करेला, लौकी तुंबा वाली, छोटे भटा, कचनार, पीपली, ताजी मिर्च, राजमा, मसूर, कोदो, सेमर किसी भी प्रकार के गोंद, बासी कोई भी वस्तु, नारियल जामुन, बाय बिल्डिंग, नालिका अनाड़ी साग या कमल ककड़ी पोई साग शॉप राजगिरा परवल हींग लहसुन कुकुरमुत्ता गोलू की काला नमक स्वयं तरबूज लाल शलजम गाजर जीरा सफेद भटा, हरा भटा गोल, काला बैंगन, बल्लर, नारियल, तमाखू, लसोड़े, अरहर तुवर दाल प्याज लहसुन काला जीरा कुलथी अलसी चना वर्जित है।

17. श्राद्ध किन स्थानों पर नहीं देना चाहिए

किसी दूसरे के घर में कि रात कलिंग कोकण खर्च देशों में सिंधु नदी के उत्तर किनारे पर नर्मदा नदी के दक्षिण किनारे पर करतो या नदी के पूर्वी किनारे पर। नर्मदा नदी के प्रकरण में परिहार या खंडन भी प्राप्त होता है एवं गोदावरी का जहां से उद्भव हो ऐसे सभी क्षेत्र शादी के लिए उपयुक्त हैं पवित्र हैं

18. तीर्थ स्थान या घर में श्राद्ध कर्म किस स्थान पर श्रेष्ठ माना गया है?

तीर्थ स्थान से 8 गुना अधिक पुण्य अपने घर में श्राद्ध करने वाले को मिलता है। संदर्भ प्रभास खंड। गया आदि क्षेत्र में श्राद्ध अनेक पुत्र हो तो सभी को करना चाहिए या 1 पुत्र के द्वारा करने पर भी भविष्य में आवश्यकता नहीं होती है इस संदर्भ में एक पुत्र भी गया जाकर प्रदान करता है नील वृष् का त्याग करता है अन्य पुत्रों के लिए आवश्यक नहीं।

19. गया में सर्वश्रेष्ठ स्थान कौन सा है!

गया में शमी पत्र के आकार के पिंड “गया सिर” मैं देने से 100 कुल तथा 7 गोत्रों का उद्धार होता है। संदर्भ ग्रंथ वायु पुराण श्री स्थली सेतु।

20. सात गोत्र कौन से होते हैं?

पिता, माता ,पत्नी, बहन बहनोई ,कन्या दामाद ,पिता और माता की बहन यह सात गोत्र। नए अन्न से श्राद्ध कर्म कब वर्जित होता है? जन्म नक्षत्र, जन्म की तिथि में, अश्लेषा कृतिका, जेष्ठा, मूल, पूर्वाभाद्र नक्षत्र, गुरुवार मंगलवार दिन, चतुर्थी नवमी चतुर्दशी तिथि में करना मना है।

21. अन्य के द्वारा भी गयाशिर मे, श्राद्ध करने पर शाश्वत माना गया है या नहीं!

पितरों का श्राद्ध गया सिर में किसी भी पुरुष के द्वारा किसी के लिए भी सौदागर किया जाता है और पिंडदान दिया जाता है जिसके नाम से उसको शाश्वत ब्रह्म पद प्राप्त होता है।

22. श्राद्ध पितरों के लिए यदि गया में दो-तीन बार जाकर करना हो ,तो क्या ध्यान रखना चाहिए!

इस संदर्भ में स्पष्ट है कि यदि पितरों से प्रेम वर्ष बार-बार गया जाने एवं उनकी प्रसन्नता की इच्छा हो तो प्रेतशिला पर गया में श्राद्ध न करें। प्रेतशिला में श्राद्ध करने से पिता प्रेत कार्य से विमुक्त हो जाते हैं। यदि एक बार जाना हो केवल तो प्रेतशिला पर श्राद्ध या पिंडदान उचित है।

23. जिस स्त्री का पुत्र हो उसे अपने पति का श्राद्ध किसी तीर्थ में करना चाहिए?

नहीं स्मृति ग्रंथों के अनुसार जिस स्त्री का पुत्र हो उसे अपने पति के श्राद्ध नहीं करना चाहिए पद्म पुराण तीर्थ प्रकरण

24. पित्र कर्म में जनेऊ या कार्य किस दिशा की ओर से करना चाहिए ?

पितरों को अर्पित किए जाने वाले गंध,जल, धूप आदि पदार्थ अपस्वय, अप्रदीक्षिणा अर्थात बाई ओर से किए जाने का विधान गरुण पुराण में उपलब्ध है।

पिता के जीवित होते हुए माँ गोलोकवासी हो जाये तो पुत्र का पार्वणश्राद्ध के सम्बन्ध में क्या अधिकार है?

पिता जीवित हो और माँ का स्वर्गवास हो जाये पुत्र केवल वार्षिक श्राद्ध कर सकता है, तर्पण एवं पार्वण श्राद्ध नहीं कर सकता।

 

आलेख : पंडित विजेंद्र तिवारी – ज्योतिषाचार्य

मो. 09424446706  

पंडित वी. के. तिवारी

 

श्राद्ध (पितर) पक्ष पर आधारित यह पांचवीं जानकारी हैं। 

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