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शारदीय नवरात्री 7 अक्टूबर से 14 अक्टूबर : प्रतिदिन पूजा प्रारम्भ के समय सर्वप्रथम यह पढ़ें, श्रद्धाभाव से करें आरती

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शारदीय नवरात्री : 7 अक्टूबर से 14 अक्टूबर 2021, दैनिक भोग – अर्पण, मंत्र। प्रतिदिन पूजा प्रारम्भ के समय सर्वप्रथम यह पढ़ें। मातारानी की कृपा सदैव बनी रहेगी :

नवग्रहाय नमः।
ओम हृीं क्रीं क्रीं क्रां चंडिका देव्यै शाप नाश अनुग्रहं कुरू 2।
नमः गणाधिपतये नमः।
ओम ब्रहम वशिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव।
कुल्लुका मंत्र – क्रीं हूं स्त्रीं ह्रीं फट्।

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पूजा के पूर्व अंगों को स्पर्श करते हुए पढ़े :-

ओम ऐं हृीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः।
ओम मूलं 9 नमः शिरसे स्वाहा।
ओम मूलं 9 नमः शिखायै वषट्।
ओम मूलं 9 नमः कवचाय हुम।
ओम मूलं 9 नमः नेत्र त्रयाय वौषट।
ओममूलं 9 नमः अस्त्राय फट्। हृदयाय नमः।

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दुर्गा अध्याय तिथि के अनुसार :

प्रतिपदा-प्रथम अध्याय;
द्वितीया-द्वितीय; तृतीय;
तृतीया-चतुर्थ अध्याय;
चतुर्थी-पंच, सष्ठ सप्तम, अध्याय;
पंचमी- अष्ठम नवंम;
शष्ठी- दशम, एकादश ;
सप्तमी-द्वादश अष्टमी- त्रयोदश।

कलश/ घट स्थापना शुभ समय-धनु लग्न 11.49.-12.26 बजे अभिजित मुहूर्त, 12:08 मिनट तक चन्द्र ग्रह की उत्तम होरा, 13:21 तक।  मध्याह्न काल शुभ (अधिकतम-11:33-13.37 बजे तक) शुभ समय है। 
नारियल कलश पर आड़ा रखे, मोटा भाग अपनी ओर हो, कलश मे नारियल फसाना अशुभ, वर्जित।

दीपक प्रज्वलित नमस्कार मंत्र

रुई की श्वेत बत्ती वर्जित उसे लाल नरगी रंग ले या मौली। कलावा की बत्ती प्रयोग करें :
दीप ज्योति पर ब्रह्म, दीप ज्योति जनार्दनाः।
दीपो हरतु पापम, संध्या दीप नमोस्तुतेः।
शुभं करोति कल्याणं, आरोग्य सुख संपदामः।
शत्रु बुद्धि विनाशानं, मम् सर्व बाधा हरणं।

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देवी दुर्गा की आरती

जगजननी जय ! जय!! माँ जगजननी जय ! जय !! ।
भय हरिणी, भव तारिणि भव भामिनि जय जय।। टेक ।।
तू ही सत्-चित-सुखमय शुद्ध ब्रम्हरूपा ।
सत्य सनातन सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा ।।1।। जग.
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर अज आनॅदराशी ।।2।। जग.
अविकारी, अघ हारी, अकल कला धारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर सॅहार कारी ।।3।। जग.
तू विधि, वघू, रमा, तू उमा, महा माया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी, जाया।।4।। जग.
राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वान्छा कल्प द्रुम, हारिणि सब बाधा।।5।। जग.
दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्र करा।
अष्ट मातृका, योगिनि, नव-नव-रूप-धरा ।।6।। जग.
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशान विहारिणि, ताण्डव-लासिनि तू ।।7।। जग.
सुर-मुनि-मोहिनी सौम्या तू शोभा धारा।
विवसन विकट-सरूपा, प्रलय मयी, धारा।।8।। जग.
तू ही स्नेहसुधामयि, तू अति गरलमना।
रत्न विभूषीत तू ही, तू ही अस्थि-तना ।।9।। जग.
मूलाधार निवासिनी, इह-पर-सिद्धिप्रदे ।
काला तीता काली, कमला तू वरदे ।।10।। जग.
शक्ति शक्ति धर तू ही नित्य अभेद मयी ।
भदे प्रदर्षिनि वाणी विमले ! वेदत्रयी ।।11।। जग.
हम अति दीन दुखी माँ ! विपत-जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ।।12।। जग.
निज स्वभाव वश जननी ! दया दृष्टि की जै।
करूणा कर करूणा मयि ! चरण-शरण दीजै ।।13।। जग.

(आलेख : पं. विजेन्द्र कुमार तिवारी – ज्योतिषाचार्य)

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