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कार्तिक पूर्णिमा 19 नवम्बर शुक्रवार : कार्तिक पूर्णिमा में हैं दान का विशेष महत्व, पढ़ें यह पौराणिक कथा

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19 नवम्बर शुक्रवार कार्तिक पूर्णिमा : कार्तिक पूर्णिमा में दान का विशेष फल मिलता हैं। आज के दिन के गए दान का विशेष महत्व भी हैं। पढ़ें यह पौराणिक कथा।

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कार्तिक पूर्णिमा में दान एवं फल

  • बैल (वृषभ) दान : उच्च पद के अभिलाषी, बड़े व्यापारी  एवम राजनेता वर्ग को अथवा जो सक्षम है इनके द्वारा बैल (वृषभ) दान करने से शिवत्व प्राप्त होता है। (मत्स्य पुराण)।
  •  गाय, हाथी, वाहन, घोड़ा, घी दान : ऐश्वर्य, समृद्धि, संपत्ति आदि की वृद्धि होती है। (लेख अधिक बड़ा न हो इसलिए संक्षिप्त)। (निर्णयामृत)।
  •  कन्या दान का संकल्प : अपनी या पराई या दान से “संतान व्रत” पूर्ण होता है एवं संतान के द्वारा जीवन में सुख प्राप्त होता है। (हेमाद्रि)।
  •  सर्व ग्रह दोष से मुक्ति के लिए : स्वर्ण मेष निर्मित कर दान या अर्पण करे। (भविष्य पुराण)
    ग्रहों के दोषों या कष्टों से मुक्ति के लिए, अपनी समय-समय पर मनोकामनाएं या मनोरथ सिद्ध करने के लिए व्रत कर (सरल विधि यह है कि, प्रत्येक माह की पूर्णिमा को स्वामी कार्तिकेय के दर्शन एवं पूजन तथा द्वार पूजा जैसा कि ऊपर ही उल्लेखित है करना चाहिए। (हेमाद्रि)।

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पौराणिक कथा 

राजा युधिष्ठिर को भगवान श्री कृष्ण द्वारा कार्तिक माह की पूर्णिमा के विषय में बताया गया हैं कि, दान सुपात्र – ब्राह्मणों को दान करना उपयोगी तो है ही परंतु बहन भांजा डूबा एवं जो निर्धन हैं जिन्हें आवश्यकता है उनको भी दान देने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है। विपत्ति में जो हो उसकी सहायता या उसकी आवश्यकता के अनुरूप दान करना भी अति श्रेष्ठ माना गया है। अपेक्षा से आए अतिथि को भी दान देने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

भगवान रामचंद्र सीता एवं अनुज लक्ष्मण सहित वन के लिए निकल गए थे। उस समय भरत अपने नाना के परिवार में ननिहाल में थे। मां कौशल्या को भरत के विषय में सशंकित कर दिया गया था। परिवार के सदस्यों ने कि श्री राम के वन गमन के पीछे, भरत ही मुख्य व्यक्ति हैं। जब वे नाना के घर से वापस आए तो भरत जी को सारी बातें तथ्यात्मक ज्ञात हुई। उन्होंने अनेक प्रकार से माता कौशल्या तथा अपनी मां को समझाया। भरत की कोई बात विश्वसनीय प्रतीत नही हुई। भरत ने अनेक प्रकार से कोशिश की कि मेरे मन को स्वप्न में भी इस प्रकार के तुच्छ विचार कभी नही आये। परंतु माता कौशल्या को विश्वास नहीं हुआ।

अंतत: भरत ने संकल्प लिया, शपथ ली (जब भरत ने कहा) “मां भगवान श्री राम मेरे अग्रज है, पूज्य है। भैय्या श्रीराम को वन गमन में यदि मेरी सम्मति रही हो, यदि उनको बनवास भेजने में यदि मेरी कोई इच्छा या मेरी कोई युक्ति रही हो तो देवताओं द्वारा पूजित तथा अनेक प्रकार के पुण्य प्रदान करने वाली कार्तिक माह की पूर्णिमा मेरे बिना स्नान दान के ही व्यतीत हो एवं मुझे निम्न गति, अधोगति प्राप्त हो।”

इस प्रकार की महान/बड़ी शपथ सुनते ही माता कौशल्या को विश्वास हो गया कि भरत को राज्य की महत्वाकांक्षा या लालच नही है।परिजनों ने भ्रामक, अनर्गल् मेरे कान भरे है। उन्होंने भरत को अपने अंक में छुपा लिया अपने सीने से लगा लिया। अनेक प्रकार से भरत जी को आश्वस्त किया कि अब मेरे मन में तुम्हारे प्रति किसी भी प्रकार की कोई शंका नहीं है। तुम भ्रात श्रेष्ठ  हो। इस तिथि को जल, वस्त्र ,स्वर्ण पात्र ,छत्र आदि दान करने वाले व्यक्ति को इंद्रलोक प्राप्त होता है।

आलेख : पं. वी.के. तिवारी ज्योतिषाचार्य

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