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कुछ लोग हमारी आध्यात्मिकता को अंधविश्वास का नाम दे देते हैं: उपराष्ट्रपति धनखड़ 

Vice President on Sanatan: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित साइंस सिटी में गौड़ीय मिशन के संस्थापक आचार्य श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद के 150वें आगमन स्मरणोत्सव के समापन समारोह को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने भयावह चुनौतियां हैं, लेकिन आज के दिन सबसे ज्यादा जो संकट है वो मानव के मन में है। मानव अशांत है। साधन, सम्पन्नता, शक्ति के बावजूद कमी है शांति की। दुनिया में जब लोगों को यह कमी महसूस होती है तो उनको एक ही उत्तरी तारा दिखाई देता है – भारत।

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उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भूमि है, जिन्होंने राष्ट्रवाद से कभी समझौता नहीं किया। कितना बड़ा बलिदान दिया। आज हम सुखद कालखंड में हैं कि जो चिंता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी, जो उनकी सोच थी, राष्ट्रवाद के प्रति कटिबद्धता थी, और जो नासूर उनको नजर आ रहा था, आज वह नासूर हमारे संविधान में नहीं है। भारत विश्व का सांस्कृतिक केंद्र है और कोलकाता संस्कृति के केंद्रों में से एक है। किसी भी देश का सबसे बड़ा अलंकरण अगर है तो उसकी संपदा नहीं उसकी संस्कृति है। संस्कृति अगर एक बार गड़बड़ हो गया तो फिर गिरावट रुक नहीं सकती। आज आवश्यकता है कि हमारे बालक-बालिकाओं को हमारी संस्कृति का बोध हो। (Vice President on Sanatan)

उन्होंने कहा कि संस्कृति से जुड़े हुए जितने भी तत्व हैं, उनका संरक्षण, उनको कायम करना, उनका संरक्षण करना, उनका सृजन करना बहुत जरूरी है क्योंकि वह भारत को परिभाषित करते हैं। कुछ लोग नासमझी, अनजाने में, अंधा-धुंध अर्थ प्राप्ति में लगने के कारण जो हमारे सात्विक तत्व हैं – अध्यात्म, इसको आडंबर कह देते हैं। हमें कर्मयोगी बनना पड़ेगा और हमें अपनी सभ्यता और मूल्य प्रणाली को संरक्षित करने और कुछ हद तक फिर प्राप्त करने और पुनर्जीवित करने के तरीके से कार्य करना होगा। धर्म को रूढ़िवादी तरीके से नहीं देख सकते। धर्म को संकीर्ण दायरे में आकलन नहीं कर सकते। धर्म का अर्थ समझना पड़ेगा और तभी अंदाजा होगा कि हम सबको कृतसंकल्प होकर भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना है और भारत का विश्वगुरु बनना दुनिया के लिए सबसे बड़ा शुभ संदेश है। (Vice President on Sanatan)

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि हमारी संस्कृति में हमने क्रूरता सहन की है, आक्रमण सहन किए हैं, बर्बरता देखी है। हमारे धार्मिक स्थलों, हमारी संस्कृति के प्रतीकों के साथ कैसी बर्बरता, विशालता, विनाशकारी की पराकाष्ठा। नालंदा को जब आग लगी, तो अंदाजा लगाइए कि क्या-क्या नष्ट हुआ। कितनी मंजिल की नालंदा थी, कितनी लाख किताबें थीं और वह सिर्फ भारत के लिए नहीं थी, विश्व के लिए थीं। आज के दिन जितनी तकनीक की प्रगति हो रही है, उसका कोई न कोई सूत्र और सोच हमारे ज्ञान के भंडार में है। भारत क्या है? हमारी संस्कृति इसको परिभाषित करती है। आज के दिन हैं ऐसी ताकतें हैं, जो इस पवित्र भूमि पर कुदृष्टि रखती हैं। ऐसे मौके पर हमें सजग रहने की आवश्यकता है। हमारे मूल सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी। (Vice President on Sanatan)

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि आज के दिन हम क्या देख रहे हैं? एक दूसरे को सहन नहीं कर पा रहे हैं, टकराव का वातावरण तुरंत बन जाता है। दूसरे की बात गलत है—इस पर अडिग है। हमारी संस्कृति का मूल सिद्धांत था अभिव्यक्ति, उसका मूल सिद्धांत था वाद-विवाद। हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा अलंकरण था -अनंतवाद। दूसरे की बात सुनो, दूसरे की बात समझो, इतने अहंकार में आओ कि यह सोच लो कि मेरे अलावा दूसरा सही कैसे हो सकता है? रामायण का क्या सिद्धांत है? अधर्म पर धर्म की विजय। कितनी भी विपरीत परिस्थितियां रहीं, आचरण मर्यादित रहा। मर्यादा को कभी नहीं लांघा गया और धर्म की जीत हुई। (Vice President on Sanatan)

उन्होंने कहा कि हर बात का जवाब आज के दिन सनातन में मिल सकता है। सनातन का अर्थ समावेशिता से है, सनातन का अर्थ सार्वभौमिक अच्छाई है, सनातन का अर्थ आत्मा की सर्वोच्चता है, सनातन अधीनता में विश्वास नहीं करता है। अगर आप सनातन के प्रति समर्पण करते हैं, तो आप बंदी नहीं हैं, आप एक स्वतंत्र व्यक्ति, एक स्वतंत्र आत्मा बन जाते हैं। यही कारण है कि सनातन पर कुछ लोग कुदृष्टि डाल रहे हैं और भारत के मूल सिद्धांत के ऊपर कुछ ऐसी चुनौतियां आ रही है कि- संख्या बल बढ़ा लो, लोगों को लालच के वशीभूत कर दो। सजग रहने की आवश्यकता है। कुछ लोग अज्ञानतावश आध्यात्मिकता जैसे हमारे सात्विक तत्वों को अंधविश्वास का नाम दे रहे हैं। कुछ लोग, अज्ञानतावश या अंधाधुंध अर्थ प्राप्ति में लगे होने के कारण, गलत तरीके से आध्यात्मिकता जैसे हमारे सात्विक तत्वों को अंधविश्वास का नाम दे देते हैं। (Vice President on Sanatan)

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